Last Updated on October 31, 2026 by KevalKrishan
भारत ने 30 अक्टूबर 2026 की रात अपना नया नेविगेशन उपग्रह NVS-03 सैटेलाइट सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेजा। इसरो (ISRO) ने इसे GSLV-F18 रॉकेट से श्रीहरिकोटा से छोड़ा। यह उपग्रह भारत के अपने GPS यानी NavIC को फिर से मज़बूत करेगा। इस लेख में हम सरल भाषा में जानेंगे कि NVS-03 satellite kya hai, इसे कब और कैसे छोड़ा गया, GSLV-F18 रॉकेट की खासियत क्या है, NavIC क्या है और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इससे जुड़े सबसे ज़रूरी तथ्य कौन-से हैं।
📌 संक्षेप में उत्तर: NVS-03 क्या है?
NVS-03 इसरो की दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह श्रृंखला (NVS) का तीसरा उपग्रह है। लगभग 2,250 किलोग्राम वज़न वाले इस उपग्रह को 30 अक्टूबर 2026 को रात 11:51 बजे GSLV-F18 रॉकेट से श्रीहरिकोटा से छोड़ा गया और इसे जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में स्थापित किया गया। इसका काम भारत की नेविगेशन प्रणाली NavIC की सेवाएँ लगातार जारी रखना है।
NVS-03 सैटेलाइट: एक नज़र में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| उपग्रह का नाम | NVS-03 (नेविगेशन सैटेलाइट) |
| प्रक्षेपण यान | GSLV-F18 (GSLV की 20वीं उड़ान) |
| प्रक्षेपण तिथि और समय | 30 अक्टूबर 2026, रात 11:51 बजे (भारतीय समय) |
| प्रक्षेपण स्थल | सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC SHAR), श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश (दूसरा लॉन्च पैड) |
| उपग्रह का वज़न | लगभग 2,250 किलोग्राम |
| कक्षा | जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) |
| नेविगेशन संकेत | L1, L5 और S बैंड |
| सेवा क्षेत्र | पूरा भारत और उसकी सीमा से लगभग 1,500 किमी आगे तक |
| मिशन जीवन | 12 वर्ष (डिज़ाइन के अनुसार) |
| प्रणाली | NavIC (भारत की क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली) |

📖 इस लेख में क्या है
- NVS-03 सैटेलाइट क्या है?
- NVS-03 लॉन्च: तारीख, समय और स्थान
- GSLV-F18 रॉकेट की पूरी जानकारी
- NVS-03 की कक्षा (GTO) क्या है?
- NVS-03 की प्रमुख विशेषताएँ
- NavIC क्या है और GPS से कैसे अलग है?
- NVS-03 क्यों ज़रूरी था? NVS-02 की कहानी
- NVS श्रृंखला: NVS-01 से NVS-05
- परीक्षा उपयोगी 20 तथ्य
- अभ्यास प्रश्न (MCQ)
- FAQ
NVS-03 सैटेलाइट क्या है? (NVS-03 Satellite kya hai)
NVS का पूरा अर्थ है नेविगेशन सैटेलाइट (Navigation Satellite)। इसरो ने भारत की नेविगेशन प्रणाली NavIC को चलाते रहने के लिए दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों की एक नई श्रृंखला शुरू की है, जिसे NVS श्रृंखला कहा जाता है। NVS-03 इस श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है।
इसरो के मिशन ब्रोशर के अनुसार NVS-03 का मुख्य उद्देश्य IRNSS (NavIC) सेवाओं की निरंतरता बनाए रखना है। पहली पीढ़ी के कई IRNSS उपग्रह अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं या उनमें खराबी आ चुकी है, इसलिए नई पीढ़ी के उपग्रह उनकी जगह ले रहे हैं।
सीधे शब्दों में कहें तो जैसे अमेरिका का GPS हमारे मोबाइल को बताता है कि हम कहाँ हैं, वैसे ही भारत का NavIC यह काम भारत और आसपास के क्षेत्र के लिए करता है, और NVS-03 इसी प्रणाली का एक नया, आधुनिक हिस्सा है।
NVS-03 लॉन्च: तारीख, समय और स्थान (NVS-03 Launch Date)
- तारीख: 30 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
- समय: रात 11:51 बजे (भारतीय मानक समय)
- स्थान: सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) का दूसरा लॉन्च पैड (SLP)
- रॉकेट: GSLV-F18
- परिणाम: सफल। उड़ान के लगभग 18 मिनट बाद उपग्रह रॉकेट से अलग होकर अपनी तय कक्षा (GTO) में पहुँच गया।
इसरो के अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन ने मिशन को सफल बताया और कहा कि रॉकेट ने उपग्रह को बहुत सटीकता के साथ निर्धारित कक्षा में पहुँचाया।
GSLV-F18 रॉकेट की पूरी जानकारी
GSLV का पूरा नाम है जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle)। GSLV-F18 इस रॉकेट की 20वीं उड़ान थी। इसकी ऊँचाई लगभग 50 मीटर और उड़ान भरते समय कुल वज़न लगभग 420 टन था। इसमें तीन चरण (स्टेज) होते हैं और सबसे ऊपर 3.4 मीटर व्यास का धातु का पेलोड फेयरिंग (उपग्रह का सुरक्षा कवच) लगा होता है।
| चरण | ईंधन | लंबाई | ईंधन का वज़न |
|---|---|---|---|
| पहला चरण: S139 (कोर, ठोस ईंधन) | HTPB (ठोस) | 20.1 मी | 138.2 टन |
| पहला चरण: 4 × L40H (स्ट्रैप-ऑन) | UH25 + N2O4 (तरल) | 19.6 मी | 170.6 टन |
| दूसरा चरण: GL40HT | UH25 + N2O4 (तरल) | 11.9 मी | 42.1 टन |
| तीसरा चरण: CUS15 (क्रायोजेनिक) | तरल हाइड्रोजन + तरल ऑक्सीजन | 9.8 मी | 14.4 टन |
याद रखने लायक बात: GSLV का तीसरा चरण क्रायोजेनिक होता है। क्रायोजेनिक इंजन बहुत ठंडे तापमान पर द्रव में बदली हुई हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करता है। यही चरण भारी उपग्रहों को ऊँची कक्षा तक पहुँचाने की ताकत देता है।
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NVS-03 की कक्षा (GTO) क्या है?
GSLV-F18 ने NVS-03 को सीधे उसकी अंतिम कक्षा में नहीं, बल्कि जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में छोड़ा। GTO एक अंडाकार (दीर्घवृत्ताकार) कक्षा होती है, जिसका एक सिरा पृथ्वी के पास और दूसरा बहुत दूर होता है। इसरो के अनुसार यह कक्षा इस प्रकार तय की गई:
- पेरिजी (पृथ्वी से सबसे नज़दीकी बिंदु): 170 किमी
- एपोजी (पृथ्वी से सबसे दूर का बिंदु): 37,023 किमी
- झुकाव (इनक्लिनेशन): 20.75°
GTO में पहुँचने के बाद उपग्रह अपने खुद के इंजन (प्रणोदन प्रणाली) से धीरे-धीरे कक्षा ऊँची करता है और अपनी अंतिम कार्य-कक्षा तक पहुँचता है। इसके बाद जाँच (कमीशनिंग) पूरी होने पर यह NavIC सेवा देना शुरू करता है।
NVS-03 की प्रमुख विशेषताएँ
- तीन तरह के संकेत: पहले से चल रहे L5 और S बैंड के साथ इसमें L1 बैंड का नया संकेत भी जोड़ा गया है। L1 वही बैंड है जिसका इस्तेमाल दुनिया की बड़ी नेविगेशन प्रणालियाँ भी करती हैं, इसलिए आम उपकरणों में NavIC का उपयोग आसान होता है।
- स्वदेशी परमाणु घड़ी: नेविगेशन में समय की बहुत सटीक गणना ज़रूरी होती है। NVS-03 में भारत में बनी परमाणु घड़ी के साथ बाहर से खरीदी गई परमाणु घड़ियाँ भी लगी हैं।
- बड़ा सेवा क्षेत्र: पूरा भारत और उसकी सीमा से लगभग 1,500 किमी आगे तक का क्षेत्र।
- वज़न: लगभग 2,250 किलोग्राम।
- लंबी उम्र: इसे 12 वर्ष तक काम करने के लिए बनाया गया है।
NavIC क्या है? (भारत का अपना GPS)
NavIC भारत की अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली है। इसका पुराना नाम IRNSS (Indian Regional Navigation Satellite System) है। यह PNT यानी Position (स्थिति), Navigation (दिशा) और Timing (समय) की सेवाएँ देती है। इसका मुख्य सेवा क्षेत्र भारत है।
NavIC को कुल सात उपग्रहों के समूह के रूप में बनाया गया है। अपने दम पर सही स्थिति बताने के लिए इसमें कम से कम चार उपग्रहों का काम करना ज़रूरी है।
NavIC और GPS में अंतर
| आधार | NavIC | GPS |
|---|---|---|
| देश | भारत (इसरो) | अमेरिका |
| क्षेत्र | क्षेत्रीय (भारत + 1,500 किमी) | वैश्विक (पूरी दुनिया) |
| नियंत्रण | भारत के अपने हाथ में | विदेशी नियंत्रण |
| महत्व | आपात स्थिति में भी देश की अपनी सेवा | दुनिया भर में सामान्य उपयोग |
NavIC के उपयोग: वाहनों की ट्रैकिंग, मोबाइल में रास्ता खोजना, समुद्र में मछुआरों को दिशा बताना, आपदा प्रबंधन, और बैंकिंग व बिजली ग्रिड जैसी व्यवस्थाओं के लिए सटीक समय। अपनी प्रणाली होने से भारत को किसी दूसरे देश की नेविगेशन सेवा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
नेविगेशन उपग्रह काम कैसे करता है?
हर नेविगेशन उपग्रह लगातार एक संकेत भेजता है, जिसमें यह जानकारी होती है कि संकेत किस समय भेजा गया और उस समय उपग्रह कहाँ था। आपके मोबाइल या GPS उपकरण में लगा रिसीवर यह देखता है कि संकेत को उस तक पहुँचने में कितना समय लगा। संकेत प्रकाश की गति से चलता है, इसलिए समय से दूरी निकाली जा सकती है।
जब रिसीवर को कम से कम चार उपग्रहों से संकेत मिलते हैं, तो वह इन दूरियों को मिलाकर अपनी सटीक स्थिति (अक्षांश, देशांतर और ऊँचाई) और सही समय निकाल लेता है। यही कारण है कि किसी भी नेविगेशन प्रणाली में कम से कम चार उपग्रहों का एक साथ दिखना ज़रूरी होता है।
यहाँ परमाणु घड़ी की भूमिका सबसे अहम है। समय में एक सेकंड के दस लाखवें हिस्से की गलती भी स्थिति में सैकड़ों मीटर की गड़बड़ी कर सकती है। इसलिए नेविगेशन उपग्रहों में बेहद सटीक परमाणु घड़ियाँ लगाई जाती हैं, और NVS-03 में स्वदेशी परमाणु घड़ी का होना भारत के लिए बड़ी तकनीकी उपलब्धि है।
GTO, GSO और GEO में अंतर
- GTO (जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट): एक अस्थायी अंडाकार कक्षा, जिसमें रॉकेट उपग्रह को छोड़ता है। यहाँ से उपग्रह अपने इंजन से ऊपर उठता है।
- GEO (जियोस्टेशनरी ऑर्बिट): भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर लगभग 35,786 किमी की ऊँचाई पर गोलाकार कक्षा। यहाँ उपग्रह पृथ्वी के घूमने के साथ 24 घंटे में एक चक्कर लगाता है, इसलिए धरती से एक ही जगह स्थिर दिखाई देता है।
- GSO (जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट): इसमें भी एक चक्कर 24 घंटे में पूरा होता है, लेकिन कक्षा भूमध्य रेखा से झुकी होती है, इसलिए धरती से उपग्रह आकाश में अंग्रेज़ी के “8” जैसा रास्ता बनाता हुआ दिखता है।
NavIC के उपग्रह GEO और झुकी हुई GSO, दोनों तरह की कक्षाओं में रखे जाते हैं, ताकि भारत के ऊपर हर समय पर्याप्त उपग्रह दिखते रहें।
दुनिया की प्रमुख उपग्रह नेविगेशन प्रणालियाँ
| प्रणाली | देश/संगठन | प्रकार |
|---|---|---|
| GPS | अमेरिका | वैश्विक |
| GLONASS | रूस | वैश्विक |
| Galileo | यूरोपीय संघ | वैश्विक |
| BeiDou | चीन | वैश्विक |
| QZSS | जापान | क्षेत्रीय |
| NavIC | भारत | क्षेत्रीय |
परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि कौन-सी प्रणाली किस देश की है। याद रखें: GLONASS रूस, Galileo यूरोप, BeiDou चीन, QZSS जापान और NavIC भारत की प्रणाली है।
NVS-03 क्यों ज़रूरी था? NVS-02 की कहानी
NavIC के लिए इसरो अब तक 12 उपग्रह छोड़ चुका है, जिनमें 9 पहली पीढ़ी के IRNSS और 3 दूसरी पीढ़ी के NVS उपग्रह हैं। पहली पीढ़ी के कई उपग्रहों में परमाणु घड़ियों की खराबी आई और वे अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं। NVS-03 से पहले केवल तीन उपग्रह (IRNSS-1B, IRNSS-1I और NVS-01) पूरी सेवाएँ दे रहे थे।
इस कमी को पूरा करने के लिए NVS-02 को 29 जनवरी 2025 को GSLV-F15 से छोड़ा गया था। यह श्रीहरिकोटा से इसरो का 100वाँ प्रक्षेपण था। NVS-02 अपनी शुरुआती कक्षा (GTO) तक तो पहुँच गया, लेकिन कक्षा ऊँची करने के लिए उसका इंजन चालू नहीं हो सका। जाँच में पता चला कि ऑक्सीडाइज़र लाइन के पायरो वाल्व तक बिजली का संकेत नहीं पहुँचा, इसलिए वाल्व नहीं खुला। नतीजा यह हुआ कि NVS-02 अपनी अंतिम कक्षा तक नहीं पहुँच सका।
अब NVS-03 के काम शुरू करने पर NavIC फिर से न्यूनतम चार उपग्रहों वाली स्थिति में आ जाएगा, जो अपने दम पर सही स्थिति बताने के लिए ज़रूरी है। इसीलिए यह मिशन भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
NVS-03 से भारत को क्या फायदा होगा?
- आत्मनिर्भर नेविगेशन: देश की सुरक्षा, सेना और ज़रूरी सेवाओं के लिए भारत को किसी विदेशी प्रणाली पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। युद्ध या संकट के समय विदेशी सेवा बंद या सीमित की जा सकती है, जबकि अपनी प्रणाली हमेशा अपने नियंत्रण में रहती है।
- NavIC फिर से पूरी तरह उपयोगी: न्यूनतम चार उपग्रह होने पर NavIC अकेले भी सही स्थिति बता सकेगा।
- आम उपकरणों में आसान उपयोग: नए L1 संकेत से मोबाइल और दूसरे आम उपकरणों में NavIC को जोड़ना आसान होता है।
- स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा: भारत में बनी परमाणु घड़ी का अंतरिक्ष में इस्तेमाल यह दिखाता है कि इस बेहद कठिन तकनीक में भी देश आगे बढ़ रहा है।
- GSLV पर भरोसा: NVS-02 के समय उपग्रह की समस्या के बावजूद रॉकेट ने अपना काम ठीक किया था, और GSLV-F18 ने फिर से उपग्रह को सटीकता से उसकी कक्षा तक पहुँचाया।
NVS-03 मिशन: क्रम से (समय-रेखा)
- 30 अक्टूबर 2026, रात 11:51 बजे: श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से GSLV-F18 ने उड़ान भरी।
- पहला और दूसरा चरण: ठोस और तरल ईंधन वाले चरणों ने रॉकेट को वायुमंडल से बाहर पहुँचाया।
- तीसरा (क्रायोजेनिक) चरण: CUS15 ने उपग्रह को आवश्यक गति और ऊँचाई तक पहुँचाया।
- लगभग 18 मिनट बाद: NVS-03 रॉकेट से अलग होकर GTO में पहुँच गया।
- आगे: उपग्रह अपने इंजन से कक्षा ऊँची करेगा, अपनी कार्य-कक्षा में पहुँचेगा और जाँच पूरी होने के बाद NavIC सेवा देना शुरू करेगा।
NVS श्रृंखला: NVS-01 से NVS-05
| उपग्रह | रॉकेट | तिथि | स्थिति |
|---|---|---|---|
| NVS-01 | GSLV-F12 | 29 मई 2023 | कार्यरत |
| NVS-02 | GSLV-F15 | 29 जनवरी 2025 | अंतिम कक्षा तक नहीं पहुँचा |
| NVS-03 | GSLV-F18 | 30 अक्टूबर 2026 | GTO में सफलतापूर्वक स्थापित |
| NVS-04, NVS-05 | — | — | आगे प्रस्तावित |
NVS-03: परीक्षा उपयोगी 20 तथ्य (One Liner)
- NVS-03 इसरो की दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह श्रृंखला (NVS) का तीसरा उपग्रह है।
- NVS-03 को 30 अक्टूबर 2026 को रात 11:51 बजे छोड़ा गया।
- प्रक्षेपण यान: GSLV-F18।
- GSLV-F18, GSLV की 20वीं उड़ान थी।
- प्रक्षेपण स्थल: सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) का दूसरा लॉन्च पैड।
- NVS-03 का वज़न लगभग 2,250 किलोग्राम है।
- उपग्रह को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में छोड़ा गया।
- GTO की पेरिजी 170 किमी और एपोजी 37,023 किमी तय की गई।
- उड़ान के लगभग 18 मिनट बाद उपग्रह GTO में पहुँचा।
- GSLV-F18 की ऊँचाई लगभग 50 मीटर और उठान भार लगभग 420 टन था।
- GSLV में तीन चरण होते हैं; तीसरा चरण CUS15 क्रायोजेनिक है।
- क्रायोजेनिक चरण का ईंधन: तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन।
- पहले चरण में S139 ठोस मोटर और चार L40H स्ट्रैप-ऑन लगे होते हैं।
- NVS-03 L1, L5 और S बैंड में संकेत देता है; L1 नया जोड़ा गया है।
- इसमें स्वदेशी परमाणु घड़ी लगी है।
- सेवा क्षेत्र: भारत और सीमा से लगभग 1,500 किमी आगे तक।
- मिशन जीवन: 12 वर्ष।
- NavIC का पुराना नाम IRNSS है; यह PNT सेवाएँ देता है।
- NVS-02 को 29 जनवरी 2025 को GSLV-F15 से छोड़ा गया था, जो श्रीहरिकोटा से 100वाँ प्रक्षेपण था।
- इसरो के वर्तमान अध्यक्ष: डॉ. वी. नारायणन।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
1. NVS-03 उपग्रह को किस प्रक्षेपण यान से छोड़ा गया?
(A) PSLV-C62 (B) GSLV-F18 (C) LVM3-M7 (D) SSLV-D4
✅ उत्तर देखें
(B) GSLV-F18 – यह GSLV की 20वीं उड़ान थी।
2. NVS-03 का प्रक्षेपण कब हुआ?
(A) 29 जनवरी 2025 (B) 29 मई 2023 (C) 30 अक्टूबर 2026 (D) 15 अगस्त 2026
✅ उत्तर देखें
(C) 30 अक्टूबर 2026, रात 11:51 बजे।
3. NVS-03 उपग्रह का वज़न लगभग कितना है?
(A) 1,425 किग्रा (B) 2,250 किग्रा (C) 3,400 किग्रा (D) 4,200 किग्रा
✅ उत्तर देखें
(B) लगभग 2,250 किलोग्राम।
4. GSLV-F18 का तीसरा चरण CUS15 किस प्रकार का है?
(A) ठोस ईंधन (B) अर्ध-क्रायोजेनिक (C) क्रायोजेनिक (D) विद्युत प्रणोदन
✅ उत्तर देखें
(C) क्रायोजेनिक – इसमें तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन का प्रयोग होता है।
5. NVS-03 में पहले से चल रहे L5 और S बैंड के साथ कौन-सा नया संकेत जोड़ा गया है?
(A) L1 (B) L2 (C) C बैंड (D) Ka बैंड
✅ उत्तर देखें
(A) L1 बैंड।
6. NavIC की सेवा भारत की सीमा से लगभग कितनी दूरी तक मिलती है?
(A) 500 किमी (B) 1,000 किमी (C) 1,500 किमी (D) 3,000 किमी
✅ उत्तर देखें
(C) लगभग 1,500 किमी।
7. NVS-02 उपग्रह को किस यान से छोड़ा गया था?
(A) GSLV-F12 (B) GSLV-F15 (C) GSLV-F16 (D) GSLV-F18
✅ उत्तर देखें
(B) GSLV-F15 – 29 जनवरी 2025 को; यह श्रीहरिकोटा से 100वाँ प्रक्षेपण था।
8. NVS-03 को किस कक्षा में स्थापित किया गया?
(A) सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा (B) निम्न भू-कक्षा (C) जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (D) चंद्र कक्षा
✅ उत्तर देखें
(C) जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) – पेरिजी 170 किमी, एपोजी 37,023 किमी।
9. NavIC का पुराना नाम क्या है?
(A) GAGAN (B) IRNSS (C) INSAT (D) GLONASS
✅ उत्तर देखें
(B) IRNSS – Indian Regional Navigation Satellite System।
10. NVS-03 का डिज़ाइन मिशन जीवन कितना है?
(A) 5 वर्ष (B) 8 वर्ष (C) 10 वर्ष (D) 12 वर्ष
✅ उत्तर देखें
(D) 12 वर्ष।
FAQs: NVS-03 सैटेलाइट
❓ NVS-03 सैटेलाइट क्या है?
NVS-03 इसरो की दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है, जो भारत की नेविगेशन प्रणाली NavIC की सेवाएँ जारी रखने के लिए छोड़ा गया है।
❓ NVS-03 कब और कहाँ से लॉन्च हुआ?
NVS-03 को 30 अक्टूबर 2026 को रात 11:51 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से GSLV-F18 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया।
❓ NavIC और GPS में क्या अंतर है?
NavIC भारत की क्षेत्रीय प्रणाली है, जो भारत और उसकी सीमा से लगभग 1,500 किमी तक सेवा देती है और भारत के अपने नियंत्रण में है। GPS अमेरिका की वैश्विक प्रणाली है, जो पूरी दुनिया में काम करती है।
❓ NVS-02 मिशन क्यों विफल हुआ था?
NVS-02 अपनी शुरुआती कक्षा तक पहुँच गया था, लेकिन पायरो वाल्व तक बिजली का संकेत न पहुँचने से ऑक्सीडाइज़र का वाल्व नहीं खुला और कक्षा ऊँची करने वाला इंजन चालू नहीं हो सका। इसलिए वह अपनी अंतिम कक्षा तक नहीं पहुँचा।
❓ निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?
(1) NVS-03 को GSLV-F18 से छोड़ा गया।
(2) GSLV-F18 का तीसरा चरण ठोस ईंधन वाला है।
(3) NVS-03 L1 बैंड में भी संकेत देता है।
उत्तर: केवल कथन 1 और 3 सही हैं। GSLV का तीसरा चरण CUS15 क्रायोजेनिक है, ठोस नहीं।
❓ सत्य या असत्य: NVS-03 को सीधे उसकी अंतिम कार्य-कक्षा में स्थापित किया गया।
असत्य। GSLV-F18 ने उसे जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में छोड़ा है। आगे उपग्रह अपने इंजन से अपनी अंतिम कक्षा तक पहुँचेगा।
❓ अभिकथन (A): NVS-03 का प्रक्षेपण NavIC के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कारण (R): इससे पहले NavIC के केवल तीन उपग्रह पूरी सेवाएँ दे रहे थे, जबकि स्वतंत्र स्थिति बताने के लिए कम से कम चार ज़रूरी हैं।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
❓ NVS श्रृंखला में कितने उपग्रह प्रस्तावित हैं?
पाँच: NVS-01 से NVS-05। इनमें से NVS-01, NVS-02 और NVS-03 छोड़े जा चुके हैं, जबकि NVS-04 और NVS-05 आगे प्रस्तावित हैं।
निष्कर्ष
NVS-03 सैटेलाइट का सफल प्रक्षेपण भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक अहम कदम है। NVS-02 की असफलता के बाद यह मिशन NavIC को फिर से न्यूनतम चार उपग्रहों की स्थिति में लाने वाला है। GSLV-F18 का सटीक प्रदर्शन, स्वदेशी परमाणु घड़ी और नया L1 संकेत, ये तीनों बातें बताती हैं कि भारत अपनी नेविगेशन ज़रूरतों के लिए आत्मनिर्भर बनने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। RAS, पटवारी, CET, REET और SSC जैसी परीक्षाओं में इस विषय से प्रश्न आ सकते हैं, इसलिए ऊपर दिए 20 तथ्य और MCQ ज़रूर दोहराएँ। ताज़ा घटनाओं के लिए हमारे करंट अफेयर्स सेक्शन से जुड़े रहें।