Last Updated on August 18, 2026 by KevalKrishan
सांभर के चौहान वंश: इतिहास, वंशावली और संपूर्ण अध्ययन
आज के इस आर्टिकल में हम सांभर के चौहान वंश (Sambhar ke Chouhan / शाकंभरी के चौहान) के बारे में विस्तार से चर्चा करने वाले हैं। राजस्थान के इतिहास में सांभर के चौहान राजवंश का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यहीं से राजस्थान में चौहान सत्ता की नींव पड़ी थी। इस लेख में प्रतियोगी परीक्षाओं (RPSC, RAS, REET, SI आदि) और सामान्य अध्ययन की दृष्टि से संपूर्ण जानकारी, वंशावली, प्रमुख शासक और उनके महत्वपूर्ण कार्यों का पूरा निचोड़ प्रस्तुत किया गया है।
सांभर के चौहान वंश की वंशावली
-
वासुदेव चौहान
-
दुर्लभराज प्रथम
-
गुवक प्रथम
-
गुवक द्वितीय
-
चन्दन राज चौहान
-
वाकपतिराज प्रथम
-
सिंहराज
-
विग्रहराज द्वितीय
-
दुर्लभराज द्वितीय
-
गोविंदराज तृतीय
-
वाकपतिराज द्वितीय
-
पृथ्वीराज प्रथम
सांभर के चौहान वंश का इतिहास
वासुदेव चौहान ने 551 ई. में सांभर झील के आसपास चौहान वंश की स्थापना की थी। प्रारंभ में ये शासक गुर्जर-प्रतिहारों के सामंत के रूप में कार्य करते थे, लेकिन धीरे-धीरे अपनी सैन्य शक्ति के बल पर इन्होंने स्वतंत्र और शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की।
1. वासुदेव चौहान
-
संस्थापक: वासुदेव चौहान को चौहान राजवंश का संस्थापक, आदिपुरुष और मूलपुरुष माना जाता है।
-
स्थापना व राजधानी: वासुदेव चौहान ने 551 ई. में सांभर झील के आसपास चौहान वंश की स्थापना की और अहिछत्रपुर को अपनी प्रारंभिक राजधानी बनाया।
-
सांभर झील का निर्माण: ‘बिजोलिया शिलालेख’ के अनुसार सांभर झील का निर्माण वासुदेव चौहान ने ही करवाया था।
2. दुर्लभराज प्रथम
-
प्रतिहार सामंत: दुर्लभराज प्रथम प्रतिहार शासक ‘वत्सराज’ का सामंत था और वत्सराज के साथ रहते हुए इसने बंगाल के धर्मपाल को हराया था।
-
त्रिपक्षीय संघर्ष: दुर्लभराज प्रथम ने प्रतिहार, पाल व राष्ट्रकूटों के प्रसिद्ध त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया था, और इसी दौरान युद्ध में मारा गया।
-
विदेशी आक्रमण: इसके शासनकाल के दौरान ही अजमेर के क्षेत्र में प्रथम बार मुसलमानों का आक्रमण हुआ था।
3. गुवक प्रथम
-
वीर की उपाधि: गुवक प्रथम प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय का सामंत था। नागभट्ट द्वितीय ने गुवक को ‘वीर’ की उपाधि से सम्मानित किया था।
-
हर्षनाथ मंदिर: इसने हर्षनाथ मंदिर का निर्माण करवाया, जो चौहानों के कुलदेवता हैं।
-
स्वतंत्रता की शुरुआत: प्रारंभ में चौहान शासक गुर्जर-प्रतिहारों के अधीन सामंत थे, लेकिन गुवक प्रथम ने पहली बार अपना स्वतंत्र शासन स्थापित कर गुर्जर-प्रतिहारों की अधीनता से चौहानों को मुक्त किया।
4. गुवक द्वितीय
-
वैवाहिक संबंध: गुवक द्वितीय ने अपनी राजनीतिक शक्ति और प्रभाव को बढ़ाने के लिए अपनी बहन कलावती का विवाह कन्नौज के शासक ‘भोजराज’ के साथ किया था।
5. चन्दन राज चौहान
-
तोमर विजय: चन्दनराज ने दिल्ली के तोमर शासक रुद्र को युद्ध में पराजित किया था।
-
रुद्राणी (आत्मप्रभा): चन्दनराज की पत्नी रुद्राणी यौगिक क्रियाओं में अत्यधिक निपुण थी और वह एक परम शिवभक्त थी। वह प्रतिदिन 1000 दीपक अपने इष्टदेव महादेव के सामने जलाकर पुष्कर झील में समर्पित करती थी।
6. वाकपतिराज प्रथम
-
महाराज की उपाधि: ‘हर्षनाथ शिलालेख’ में इसे ‘महाराज’ की उपाधि दी गई है।
-
अवसर का लाभ: इसी के शासनकाल में राष्ट्रकूटों ने प्रतिहारों की शक्ति को पूरी तरह नष्ट कर दिया, जिसका पूरा फायदा उठाकर वाकपतिराज प्रथम ने प्रतिहारों के कई भू-भाग अपने राज्य में मिला लिए।
-
युद्धों का रिकॉर्ड: वाकपतिराज ने अपने जीवनकाल में अनेक युद्ध लड़े। ‘पृथ्वीराज विजय’ के अनुसार इसने कुल 188 युद्ध जीते थे।
7. सिंहराज
-
प्रतिहार संघर्ष: सिंहराज गुर्जर-प्रतिहार शासक देवपाल का सामंत था। इसने दिल्ली के तोमरों व प्रतिहारों को हराया, जिसके बाद दोनों शत्रुओं ने मिलकर षड्यंत्र के तहत सिंहराज की हत्या कर दी।
-
सेनापति की भूमिका: ‘हर्षनाथ शिलालेख’ के अनुसार इसने एक सेनापति की हैसियत से तोमर शासक ‘सलवण’ को परास्त किया था।
-
भव्य उपाधियाँ: सिंहराज ने महाराजाधिराज, परमभट्टारक तथा परमेश्वर जैसी गौरवशाली उपाधियाँ धारण की थीं।
8. विग्रहराज द्वितीय
-
योग्य शासक: विग्रहराज द्वितीय अपने शुरुआती चौहान शासकों में सबसे अधिक प्रभावशाली और योग्य शासक था।
-
चालुक्य विजय: इसने अन्हिलवाड़ा के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराया और उसे अपनी अधीनता स्वीकार कर कर (Tax) देने के लिए विवश किया।
-
आशापुरा माता मंदिर: इसने भड़ौच (गुजरात) में अपनी कुलदेवी ‘आशापुरा माताजी’ का भव्य मंदिर बनवाया।
-
हर्षनाथ शिलालेख: इसी के शासनकाल का सीकर जिले की हर्ष पहाड़ी पर ‘हर्षनाथ शिलालेख’ निर्मित हुआ, जिससे विग्रहराज के शासनकाल और इतिहास की विस्तृत एवं प्रामाणिक जानकारी प्राप्त होती है।
9. दुर्लभराज द्वितीय
-
उपाधियाँ: दुर्लभराज द्वितीय ने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की।
-
दुर्लघ्यमेरू: ऐतिहासिक अभिलेखों में इसे ‘दुर्लघ्यमेरू’ (अर्थात जिसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन न कर सके) कहा गया है।
-
नाडोल विजय: इसने नाडोल के शासक महेन्द्र चौहान को पराजित किया था।
10. गोविन्दराज तृतीय
-
वैरीघरट्ट: ‘पृथ्वीराज विजय’ ग्रंथ में गोविन्दराज तृतीय को ‘वैरीघरट्ट’ (अर्थात शत्रुओं का संहार करने वाला) कहा गया है।
-
गजनी आक्रमण रोकना: इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, गोविन्द तृतीय ने गजनी के शासक को मारवाड़ क्षेत्र में आगे बढ़ने से सफलताપૂર્વਕ रोका था।
11. वाकपतिराज द्वितीय
-
मेवाड़ विजय: वाकपतिराज द्वितीय ने मेवाड़ के शासक अम्बाप्रसाद को युद्ध में पराजित कर मार गिराया और भारी ख्याति प्राप्त की।
-
नाडोल शाखा की स्थापना: वाकपतिराज द्वितीय के पुत्र लक्ष्मण चौहान ने 960 ई. में मारवाड़ के नाडौल क्षेत्र में एक स्वतंत्र चौहान वंश की नींव रखी।
12. पृथ्वीराज प्रथम
-
बड़ी उपाधियाँ: पृथ्वीराज प्रथम ने ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की भव्य उपाधि धारण की थी।
-
तुर्क सेना का विजेता: ऐतिहासिक ग्रंथ ‘प्रबंध कोष’ में इसे ‘तुर्क सेना का विजेता’ कहा गया है।
-
चालुक्यों का संहार: इसने 1105 ई. में लगभग 700 चालुक्य सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया, जो पुष्कर क्षेत्र में यज्ञ कर रहे ब्राह्मणों को लूटने आए थे।
-
लोक कल्याण: यह एक पक्का शिवभक्त था और इसने सोमनाथ जाने वाले मार्ग पर यात्रियों के लिए निःशुल्क भोजन की विशेष व्यवस्था करवाई थी।
निष्कर्ष
आज के इस आर्टिकल में हमने सांभर के चौहान वंश (Sambhar ke Chouhan) के उद्गम, वंशावली, सभी प्रमुख शासकों और उनके ऐतिहासिक योगदान को विस्तार से कवर किया। हम पूरी आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं और सामान्य ज्ञान को मजबूत करने में बेहद मददगार साबित होगी।