Last Updated on August 23, 2026 by KevalKrishan
पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan): जीवन परिचय, इतिहास और विजय गाथा
भारतीय इतिहास के पन्नों में सम्राट पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) का नाम एक ऐसे पराक्रमी, साहसी और प्रतापी शासक के रूप में दर्ज है, जिन्हें भारतीय इतिहास का ‘अंतिम हिन्दू सम्राट’ और ‘राय पिथौरा’ के नाम से भी जाना जाता है। उनके शासनकाल में कला, साहित्य और वीरता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
इस विस्तृत लेख में हम पृथ्वीराज चौहान के जीवन परिचय, उनके इतिहास, प्रमुख विजय अभियानों और युद्धों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
पृथ्वीराज चौहान का संक्षिप्त जीवन परिचय (Prithviraj Chauhan Biography in Hindi)
| विवरण | तथ्य |
| जन्म | विक्रम संवत् 1223 (1166 ई.) |
| जन्मस्थान | पाटण, गुजरात (भारत) |
| मृत्यु | 11 मार्च 1192 |
| मृत्युस्थान | अजयमेरु (अजमेर), राजस्थान |
| उपनाम | पृथ्वीराज तृतीय, सपादलक्षेश्वर, राय पिथौरा, हिन्दू सम्राट, भारतेश्वर |
| वंश | चौहान वंश |
| पिता | सोमेश्वर |
| माता | कर्पूरदेवी |
| भाई | हरिराज |
| बहन | पृथा |
| पत्नी | संयोगिता गहड़वाल |
| पुत्र | गोविन्द चौहान |
| विरोधी शासक | मोहम्मद गौरी |
| तराइन का प्रथम युद्ध | 1191 ई. |
| तराइन का द्वितीय युद्ध | 1192 ई. |
पृथ्वीराज चौहान का जन्म और प्रारंभिक जीवन (Prithviraj Chauhan Ka Janm Kab Hua)
अजमेर के चौहान वंश का अंतिम प्रतापी शासक पृथ्वीराज तृतीय हुआ। पृथ्वीराज तृतीय (Prithviraj Chauhan) का जन्म संवत् 1223 (1166 ई.) में गुजरात की तत्कालीन राजधानी अन्हिलपाटन में हुआ था। इनके पिता का नाम (Prithviraj Chauhan Father Name) सोमेश्वर था, जो उस समय राजस्थान में अजमेर राज्य के राजा थे। इनकी माता कर्पूरी देवी थीं। इन्होंने 1177 ई. के लगभग अपने पिता सोमेश्वर की मृत्यु के बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में अजमेर का सिंहासन प्राप्त किया।
इनकी माता कर्पूरदेवी ने बड़ी कुशलता से प्रारंभ में इनके राज्य को संभाला। उसने अपनी माता कर्पूरदेवी के कुशल संरक्षण में अपना शासन प्रारंभ किया। कर्पूरदेवी ने सोमेश्वर के मन्त्रियों तथा अधिकारियों को उनके पुराने पदों पर कायम रखा। इस काल में उनका मुख्यमंत्री कदम्बवास था, जो अत्यधिक विद्वान, कुशल शासक और स्वामीभक्त व्यक्ति था। पृथ्वीराज की प्रारंभिक विजय का श्रेय कदम्बवास को जाता है। बाद के ग्रंथों का यह विवरण है कि उसकी हत्या पृथ्वीराज तृतीय ने की थी। इस समय का दूसरा प्रमुख व्यक्ति ‘भुवनैकमल्ल’ था, जो ‘कल्चुरी’ वंश का था। कर्पूरी देवी ने उसे सेनापति के पद पर नियुक्त किया।
डॉ. गोपीनाथ का मत है कि महत्त्वाकांक्षी पृथ्वीराज ने 1178 ई. के आस-पास ही शासन के सभी कामकाज अपने हाथ में ले लिए थे।
पृथ्वीराज चौहान की शिक्षा और कलाएँ (Prithviraj Chauhan Story in Hindi)
पृथ्वीराज चौहान ने अपनी 5 साल की आयु में शिक्षा ‘सरस्वती कंठाभरण विद्यापीठ’ अजमेर से प्राप्त की थी। इसके साथ ही पृथ्वीराज ने ‘श्रीराम जी’ से युद्ध कला और शस्त्रविद्या की शिक्षा भी प्राप्त की थी। पृथ्वीराज चौहान ने एक अद्भुत कला ‘शब्दभेदी बाण की कला’ में भी निपुणता प्राप्त की थी। वे इस कला में इतने निपुण थे कि उन्होंने एक दिन बिना हथियार के एक सिंह को मार दिया था। बचपन से ही पृथ्वीराज चौहान बहादुर, साहसी, पराक्रमी, वीर और युद्ध तथा शस्त्र कला में निपुण थे।
इसके अलावा पृथ्वीराज चौहान को संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश आदि छह भाषाओं का ज्ञान था। इसके साथ ही पृथ्वीराज चौहान को मीमांसा, वेदान्त, गणित, इतिहास, सैन्य विज्ञान, पुराण और चिकित्सा शास्त्र का भी ज्ञान था। पृथ्वीराज चौहान ने युद्ध-कला की पूरी शिक्षा प्राप्त की थी और आगे चलकर वह एक कुशल योद्धा भी बने थे।
भारत की तत्कालीन परिस्थितियाँ और राजनीतिक स्थिति
पृथ्वीराज तृतीय का प्रारंभिक काल देश की राजनीतिक उथल-पुथल का समय था। भारत के उत्तर-पश्चिम की ओर से मोहम्मद गौरी के नेतृत्व में मुसलमानों का दबाव बढ़ता जा रहा था। भारत में एक सबल केन्द्रीय सत्ता का अभाव था। समुच्चय देश में विविध हिन्दू राजवंशों तथा कुछ प्रदेशों पर मुस्लिम राजवंशों का शासन था। ये सभी आपसी संघर्ष में डूबे हुए थे। उत्तर-पश्चिम भारत में तीन मुस्लिम राज्य—सिंध, मुल्तान और पंजाब थे।
उत्तरी भारत में चौहानों के बाद दूसरा शक्तिशाली राज्य ‘गहड़वाल’ राठौड़ॊं का कन्नौज था। वहाँ का शासक जयचन्द चौहानों का प्रतिद्वन्द्वी था। पूर्वी भारत में पालवंश की शक्ति का पतन शुरू हो गया और उनके ही एक सामंत विजयसेन ने बिहार में एक शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था।
गुजरात में चौहानों के परंपरागत शत्रु चालुक्यों का शासन था। बुन्देलखण्ड में चंदेलों का शासन था। दक्षिण भारत भी अनेक राज्यों में विभाजित था। अधिकांश राजपूत शासक हटीले व गर्वशील थे और देश की सुरक्षा के लिए संयुक्त संगठन बनाकर शत्रु से मोर्चा लेने के बाद उनकी बुद्धि सामर्थ्य के बाहर थी, क्योंकि वे अपने में से किसी एक का नेतृत्व स्वीकार करने की मनोदशा में नहीं थे।
1175 ई. के आस-पास मोहम्मद गौरी ने मुल्तान पर आक्रमण कर उसे अधिकृत कर लिया। इसके बाद उसने उच्च के राज्य को भी जीत लिया। 1178 ई. में उसने चौहान की सीमा को पार कर गुजरात पर आक्रमण किया। गौरी के आक्रमण भावी संकट के संकेत दे रहे थे, फिर भी भारत के किसी भी शक्तिशाली हिन्दू शासक ने उसके प्रारंभिक आक्रमणों का सही मूल्यांकन करने का प्रयास नहीं किया। वे या तो उदासीन रहे, अथवा उसके आक्रमणों की उपेक्षा करते रहे और अपने पड़ोसियों को परास्त करने की कोशिश में लगे रहे।
पृथ्वीराज चौहान की सेना
पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) के पास बहुत विशाल सेना थी। इस सेना में लगभग 300 हाथी एवं 3 लाख सैनिक थे तथा उनके पास घोड़ों की भी विशाल सेना थी। उसकी सेना में घोड़ों की सेना का बहुत अधिक महत्त्व था। पृथ्वीराज की सेना काफी मजबूत और विशाल थी, इसी सेना के सहारे उसने अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की थी और अपने राज्य का विस्तार किया था। जैसे-जैसे पृथ्वीराज की विजय होती गई, वैसे-वैसे ही उसकी सेना में भी सैनिकों की वृद्धि होती रही थी।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास और प्रमुख अभियान (Prithviraj Chauhan History in Hindi)
1. नागार्जुन का दमन
नागार्जुन विग्रहराज चतुर्थ का छोटा पुत्र था। विग्रहराज चतुर्थ के बाद उसका पुत्र ‘अपरगांगेय’ सिंहासन पर बैठा था, परन्तु कुछ दिनों बाद ही पृथ्वीराज द्वितीय ने उसे मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथिया लिया। उस समय नागार्जुन बहुत छोटा था। सोमेश्वर की मृत्यु तक वह वयस्क हो चुका था, अतः उसने पृथ्वीराज तृतीय के उत्तराधिकारी को चुनौती दी और गुड़गाँव पर अपना अधिकार जमा लिया। कुछ असन्तुष्ट चौहान सरदार भी उसके पक्ष में चले गये।
जिससे उत्साहित होकर उसने भावी संघर्ष की तैयारियाँ शुरू कर दीं। इस पर पृथ्वीराज तृतीय ने अपने मुख्यमंत्री कदम्बवास की देखरेख में एक विशाल सेना के साथ नागार्जुन के केंद्र गुड़गाँव पर आक्रमण किया। उसकी सेना ने गुड़गाँव के दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया। नागार्जुन तो किसी प्रकार से भाग निकला, परन्तु उसकी माँ, पत्नी, बच्चे तथा परिवार के अन्य सदस्य पकड़ लिये गए। नागार्जुन के एक सेनानायक देवभट्ट ने आखिरी समय तक सामना किया, परन्तु वह अपने समस्त सैनिकों के साथ मारा गया।
नागार्जुन के अनेक सैनिकों और कर्मचारियों को बंदी बनाकर अजमेर लाया गया, जहाँ उन्हें मौत के घाट उतारा गया और उनके कटे हुए सिर अजमेर दुर्ग के फाटकों पर लटका दिए गए। ऐसा भावी राजद्रोहियों को चेतावनी के तौर पर किया गया। इसके बाद इतिहास में नागार्जुन का उल्लेख नहीं मिलता।
2. भण्डानकों का दमन
भण्डानक किस क्षेत्र में आबाद थे, यह विवादास्पद है। डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, “यह जाति सतलज की तरफ से आकर गुड़गाँव व हिसार जिले के आस-पास बस गयी थी।” इसके विपरीत डॉ. दशरथ शर्मा का मानना है कि यह जाति कन्नौज और हर्षपुर के मध्यवर्ती क्षेत्र में आबाद थी। शायद बयाना भी इसी राज्य में सम्मिलित था। डॉ. सत्यप्रकाश के अनुसार यह जाति रेवाड़ी तहसील के आस-पास बसी हुई थी।
विग्रहराज चतुर्थ को इन्होंने परास्त किया था, और अब वे पुनः शक्तिशाली हो गये थे। अल्पवयस्क पृथ्वीराज के राजा बनने पर अवसर का लाभ उठाते हुए भण्डानकों ने विद्रोह कर दिया, जिससे चौहान राज्य की उत्तरी सीमा असुरक्षित हो गयी। नागार्जुन का दमन करने के उपरान्त पृथ्वीराज ने भण्डानकों की तरफ ध्यान दिया। 1182 ई. के आस-पास उसने उन पर जबरदस्त आक्रमण कर दिया, उनकी बस्तियों को उजाड़ दिया और सैकड़ों को मौत के घाट उतार दिया। हजारों भण्डानक उत्तर की ओर भाग गए और शेष ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद के समय में एक शक्ति के रूप में उनका उल्लेख नहीं मिलता।
पृथ्वीराज तृतीय की दिग्विजय (Prithviraj Chauhan ki Vijay)
जैजाक भुक्ति की विजय (चंदेलों से संघर्ष)
भण्डानकों के विद्रोह का दमन करने के पश्चात् पृथ्वीराज ने चंदेलों पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इस समय चंदेलों का राज्य काफी विस्तृत था, जिसमें बुन्देलखण्ड, जैजाकभुक्ति व महोबा आदि सम्मिलित थे। महोबा उनकी राजधानी था और इस समय ‘परमार्दी चंदेल’ राज्य पर शासन कर रहा था। उसके दुव्र्यवहार से असन्तुष्ट होकर कई चंदेल राजपूत उसकी सेवा त्यागकर अन्य राजाओं के दरबार में चले गए थे। ऐसे सरदारों में आल्हा व ऊदल प्रमुख थे, जिन्होंने कन्नौज में आश्रय लिया था।
1182 ई. में पृथ्वीराज ने चंदेलों पर आक्रमण किया। ‘पृथ्वीराज रासो’ तथा ‘आल्हाखण्ड’ से पता चलता है कि चौहान ने चंदेलों की राजधानी महोबा पर विजय प्राप्त की। यद्यपि इन गल्पकाव्यों के ऐतिहासिक सत्य पर इतिहासकारों में मतभेद हैं, पर इतना निश्चित है कि पृथ्वीराज ने चंदेलों को अवश्य पराजित किया। पराजित परमार्दी को संधि करनी पड़ी। पृथ्वीराज ने चंदेलों के राज्य को अपने राज्य में नहीं मिलाया, बल्कि केवल कुछ सीमान्त गाँवों को ही अपने राज्य में मिलाया। चंदेलों व गहड़वालों का यह संगठन बाद में पृथ्वीराज के लिए ‘सैनिक व्यय’ का कारण बन गया।
गुजरात पर आक्रमण
गुजरात के चालुक्यों और सपादलक्ष के चौहानों के मध्य लम्बे समय तक संघर्ष चला आ रहा था। पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के शासनकाल में दोनों के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहे, क्योंकि सोमेश्वर का लालन-पालन अपने ननिहाल गुजरात में हुआ था। परंतु पृथ्वीराज चौहान के समय में दोनों राजवंशों में पुनः संघर्ष शुरू हो गया। दोनों के मध्य संघर्ष का मुख्य कारण दोनों राजवंशों की विस्तारवादी नीति थी। चालुक्यों का राज्य नाडौल तथा आबू तक फैला हुआ था, और नाडौल के चौहान तथा आबू के परमार गुजरात राज्य के कदर सामंत थे। दूसरी तरफ पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमाएँ भी नाडौल तथा आबू तक जा पहुँची थीं।
साहित्यिक रचनाओं और शिलालेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि 1184 ई. के आस-पास दोनों पक्षों के बीच युद्ध हुआ, और 1187 ई. के आस-पास दोनों के मध्य मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो गए।
गहड़वालों से संघर्ष और संयोगिता प्रसंग
परंपराओं के अनुसार पृथ्वीराज चौहान का कन्नौज के गहड़वाल नरेश जयचन्द के साथ भी संघर्ष हुआ था। ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार, कन्नौज नरेश जयचन्द ने अपनी पुत्री संयोगिता के स्वयंवर का आयोजन किया था और पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए उसे निमंत्रित नहीं किया तथा उसकी मूर्ति द्वारपाल के स्थान पर रख दी। संयोगिता पृथ्वीराज से प्रेम करती थी और उसने पृथ्वीराज की मूर्ति के गले में माला डाल दी। पृथ्वीराज वहाँ पहुँचकर संयोगिता को सबके सामने से अपनी राजधानी ले आए और विवाह किया।
यद्यपि कई आधुनिक इतिहासकार (जैसे डॉ. ओझा और डॉ. त्रिपाठी) संयोगिता स्वयंवर की कथा को काल्पनिक मानते हैं, वहीं डॉ. दशरथ शर्मा और डॉ. गोपीनाथ शर्मा जैसे इतिहासकार इसे ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं। वास्तविकता यह थी कि दोनों के बीच संघर्ष का असली कारण राजनीतिक विस्तारवाद और दिल्ली पर आधिपत्य जमाने की महत्वकांक्षा थी।
मुसलमानों से संघर्ष: तराइन के ऐतिहासिक युद्ध
‘तबकाते-नासिरी’ के अनुसार, 1173 में मोहम्मद गौरी को गजनी का गवर्नर नियुक्त किया गया था। इसके दो वर्ष बाद ही उसने भारत में प्रथम अभियान किया। 1186 ई. तक वह पंजाब को अधिकृत करने में सफल रहा। पंजाब विजय के परिणामस्वरूप गौरी के अधिकृत प्रदेश की सीमाएँ पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमाओं से जा मिलीं, जिससे दोनों के बीच संघर्ष अनिवार्य हो गया।
तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)
पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan 3) और मोहम्मद गौरी का प्रथम संघर्ष 1191 ई. में तराइन के मैदान में हुआ। लाहौर पर अधिकार करने के बाद गौरी ने सरहिन्द (तबरहिन्द) पर भी अधिकार कर लिया था। इसके विरोध में पृथ्वीराज अपनी सेना और अपने दिल्ली के सामंत गोविन्दराज के साथ सरहिन्द की तरफ कूच कर गए।
युद्ध के प्रारंभ से ही चौहानों का पलड़ा भारी रहा। राजपूत सेना के भीषण प्रहार से मुस्लिम सेना में खलबली मच गई। युद्ध के दौरान पृथ्वीराज के सामंत गोविन्दराज ने गौरी पर प्रहार किया जिससे गौरी बुरी तरह घायल हो गया। एक स्वामीभक्त खिलजी सैनिक ने समय रहते गौरी को घोड़े पर संभाला और युद्धभूमि से बाहर ले गया। गौरी के पलायन करते ही मुस्लिम सेना के पैर उखड़ गए। राजपूतों ने भागती हुई सेना का पीछा नहीं किया, जो इतिहासकारों के अनुसार एक रणनीतिक भूल साबित हुई।
तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)
अपनी पहली हार का बदला लेने के लिए सालभर की तैयारी के बाद लगभग 1,20,000 चुने हुए घुड़सवारों की विशाल सेना के साथ मोहम्मद गौरी ने पुनः भारत में प्रवेश किया। वह लाहौर और मुल्तान के रास्ते तराइन के मैदान में आ डटा।
गौरी ने कूटनीति और छल का सहारा लिया। उसने संधि-वार्ता के बहाने पृथ्वीराज की सेना को भ्रम में रखा और रात्रि के समय अत्यधिक गोपनीयता के साथ अपनी सेना को चार टुकड़ियों में बांटकर चारों दिशाओं से अचानक हमला कर दिया। सुबह जब हिन्दू सैनिक अपनी दैनिक क्रियाओं और विश्राम में थे, तब अचानक हुए इस आक्रमण से चौहान सेना में भगदड़ मच गई। पृथ्वीराज ने हाथी और फिर घोड़े पर सवार होकर डटकर मुकाबला किया, लेकिन दिन के तीसरे पहर तक चौहान सेना बिखर चुकी थी।
पृथ्वीराज युद्धभूमि से सिरसा की तरफ निकले, परन्तु दुर्भाग्य से वे पकड़ लिए गए। इस निर्णायक युद्ध के परिणामस्वरूप हांसी, सिरसा, समाना, अजमेर तथा दिल्ली तक के विस्तृत क्षेत्र पर मुसलमानों का अधिकार हो गया।
पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु (Prithviraj Chauhan ki Mrityu Kaise Hui)
‘पृथ्वीराज रासो’, ‘प्रबन्ध चिंतामणि’ तथा अन्य हिन्दू एवं मुस्लिम साक्ष्यों में पृथ्वीराज की मृत्यु के संबंध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं।
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चन्दबरदाई के रासो के अनुसार: गौरी उन्हें बंदी बनाकर गजनी ले गया जहाँ उनकी आँखें फोड़ दी गईं। बाद में उनके दरबारी कवि चन्दबरदाई ने वहाँ पहुँचकर शब्दभेदी बाण की कला के प्रदर्शन के दौरान एक प्रसिद्ध छंद के माध्यम से गौरी को निशाना बनाने में मदद की:
“चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चुकौ चौहान॥”
इसके बाद पृथ्वीराज और चन्दबरदाई ने एक-दूसरे को समाप्त कर लिया। हालांकि, इतिहासकार इस विवरण को पूरी तरह सत्य नहीं मानते क्योंकि गौरी इस युद्ध के काफी समय बाद तक जीवित रहा था।
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ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार: हसन निजामी और मिनहाज के विवरणों तथा डॉ. दशरथ शर्मा के मत के अनुसार, पृथ्वीराज को बंदी बनाकर अजमेर लाया गया। वहाँ जब उन्होंने गौरी के विरुद्ध षड्यंत्र रचा, तो क्रोधित होकर गौरी ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया।
पृथ्वीराज चौहान का मूल्यांकन और विरासत
पृथ्वीराज चौहान को ‘अंतिम हिन्दू सम्राट’ और ‘रायपिथौरा’ कहा जाता है। उन्होंने मात्र 11 वर्ष की अल्प आयु में अपनी प्रशासनिक और सैनिक कुशलता से चौहान राज्य को सुदृढ़ किया। वे केवल एक वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि विद्वानों और कलाकारों के महान आश्रयदाता भी थे। उनके दरबार में चन्दबरदाई, जयानक (पृथ्वीराज विजय के र लेखक), जनार्दन, आशाधर, विद्यापति गौड़ जैसे अनेक विद्वान शोभा बढ़ाते थे। उनके शासनकाल में ‘सरस्वती कंठाभरण’ नामक संस्कृत विद्यालय में 85 विषयों का अध्ययन-अध्यापन होता था।
पृथ्वीराज चौहान की तलवार और अन्य विशेषताएँ
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तलवार का वजन और माप: पृथ्वीराज चौहान की ऐतिहासिक तलवार की लंबाई 38 इंच और इसका वजन लगभग 60 किलोग्राम था। यह तलवार लगभग 790 साल पुरानी धरोहर मानी जाती है।
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घोड़े का नाम: उनके प्रिय घोड़े का नाम ‘नत्यरंभा’ था।