बागोर, मंडिया और निम्बाहेड़ा सभ्यता : Bagor, Mandia and Nimbahera Civilization(Notes)

अंतिम संशोधित (Last Updated): October 4, 2026

Last Updated on October 4, 2026 by KevalKrishan

Table of Contents

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ (बागोर, मंडिया और निम्बाहेड़ा) – विस्तृत अध्ययन नोट्स

🎯 प्रस्तावना (Introduction)

प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे RPSC Assistant Professor Paper-III, RAS, CET, REET, RPSC/RSMSSB बोर्ड परीक्षाओं) के दृष्टिकोण से बागोर, मंडिया(Mandia Sabhyata) और निम्बाहेड़ा सभ्यता(Nimbahera Sabhyata) का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस लेख में आरपीएससी असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम के अनुसार राजस्थान की प्राचीन सभ्यताओं—विशेषकर मध्य पाषाण काल (Mesolithic Period) के प्रमुख स्थलों की संपूर्ण, विस्तृत एवं अद्यतन जानकारी को समाहित किया गया है।

💡 Quick Overview Box: मुख्य बिंदु एक नजर में

  • मुख्य विषय: राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ (विशेष संदर्भ: मध्य पाषाण काल / मेसोलिथिक एज)

  • प्रमुख स्थल: बागौर (भीलवाड़ा), मंडिया (भीलवाड़ा), और निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़)

  • पुरातात्विक सर्वेक्षण के जनक (राजस्थान): ए.सी. कार्लाइल (1871)

  • भारत का सबसे बड़ा मध्य पाषाण स्थल: बागौर (भीलवाड़ा)

1. राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ एवं पाषाण युग: सामान्य परिचय व कालक्रम

  • ऐतिहासिक समय विभाजन: इतिहास में समय का अध्ययन मुख्य रूप से दो भागों में किया जाता है—ईसा पूर्व (B.C. / Before Christ) अर्थात् प्रभु यीशु के जन्म से पूर्व का समय, और ईस्वी (A.D. / Anno Domini) अर्थात् प्रभु यीशु के जन्म के बाद का समय।

  • राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण के जनक: राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण प्रारंभ करने का श्रेय ए.सी. कार्लाइल (A.C. Carllele) को जाता है, जिन्होंने 1871 में राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण का कार्य प्रारंभ किया था।

  • पाषाण कालीन संस्कृतियों का वर्गीकरण: मानव द्वारा सबसे पहले पत्थरों (पाषाण) के औजारों का प्रयोग किए जाने के कारण इस काल को ‘पाषाण काल’ कहा जाता है। इसे साक्ष्यों के आधार पर मुख्य तीन भागों में बांटा गया है:

(क) पूरा पाषाण काल (Paleolithic Period)

  • समयकाल: लगभग 2.5 लाख ईसा पूर्व से 12,000 ईसा पूर्व तक।

  • विशेषताएँ: इस काल में मनुष्य असभ्य एवं जंगली जानवरों के समान जीवन जीता था। उसे कृषि का कोई ज्ञान नहीं था; उसका मुख्य जीवन कंदमूल, मछली और शिकार पर आधारित था। इस काल के औजार बहुत खुरदरे, बड़े और मुख्य रूप से ‘क्वार्ट्जाइट’ (Quartzite) पत्थरों के बने होते थे।

  • खोज व साक्ष्य: 1870 में ए.सी. कार्लाइल ने जयपुर व इंदरगढ़ से हैंडऐक्स (हस्त कुल्हाड़ी) खोजे, जिसके कारण इसे ‘हैंडऐक्स संस्कृति’ भी कहा जाता है (ये उपकरण वर्तमान में कोलकाता संग्रहालय में सुरक्षित हैं)। इसके बाद सैटर्न कार ने झालावाड़ से और अन्य विद्वानों ने पश्चिमी राजस्थान में लूणी नदी के किनारे पाषाण उपकरण खोजे।

  • शैल चित्र: भरतपुर के ‘दर’ नामक स्थान से इस काल के शैल चित्र मिले हैं, जिन पर मानव आकृति, व्याघ्न (बाघ), बारहसिंगा और सूर्य का चित्रण मिलता है।

(ख) मध्य पाषाण काल (Mesolithic Period / Microlithic Age / मेसोलिथिक)

  • समयकाल: लगभग 12,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व तक।

  • विशेषताएँ: इस काल में मनुष्य ने आकार में बहुत छोटे प्रस्तर (पत्थर के) औजारों का प्रयोग करना शुरू किया, जिन्हें ‘माइक्रोलिथ’ (सूक्ष्म पाषाण उपकरण) कहा जाता है। इसी कारण इसे ‘लघु पाषाण युग’ या माइक्रोलिथिक युग भी कहते हैं।

  • संक्रमण काल: पूरा पाषाण काल से मध्य पाषाण काल के संक्रमण के काल को ‘एपिलोथिक काल’ कहा जाता है।

  • प्रमुख उपकरण: इस काल में स्क्रैपर (रेक्टेंगल शेप का जिसके एक या दोनों किनारे तीखे होते थे), पॉइंट (त्रिकोणात्मक), ब्लेड, इग्रेवर, ट्रायंगल, क्रिसेंट, ट्रेपेज आदि बनाए जाते थे।

  • उपयोग किए जाने वाले पत्थर: जस्पर, एगेट, चर्ड, क्वार्ट्जाइट, कैल्सिडोनी (चेल्सडोनी) और कारनेलियन। इनमें से कैल्सिडोनी पत्थर का सर्वाधिक प्रयोग किया गया।

  • सामाजिक जीवन: इस काल में मनुष्य ने पशुपालन करना सीख लिया था तथा स्थायी आवास की शुरुआत हो चुकी थी। साथ ही, तीर-कमान (क्षेपास्त्र तकनीक) का प्रयोग भी प्रारंभ हो गया था।

(ग) उत्तर पाषाण काल / नव पाषाण काल (Neolithic Period / Neolithic Age)

  • समयकाल: लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 3,000 ईसा पूर्व तक।

  • विशेषताएँ: इस काल में मनुष्य ने कृषि करना और खाद्य उत्पादन प्रारंभ कर दिया था। स्थिर ग्रामीण जीवन की शुरुआत हुई। मृतकों को जमीन में गाड़ना (समाधि देना) शुरू हुआ। चाक से मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) बनाना और पहिए का आविष्कार हो चुका था। इतिहासकार गॉर्डन चाइल्ड ने इसे ‘पाषाण कालीन क्रांति’ की संज्ञा दी है।

  • उत्तरवर्ती काल: नवपाषाण काल के बाद उत्तर भारत में ताम्रपाषाण काल (तांबे और पत्थर का युग) तथा दक्षिण भारत में महापाषाण काल / लोह युग का उदय हुआ।

2. पाठ्यक्रम में निर्धारित प्रमुख मध्य पाषाण कालीन सभ्यताएँ

1. बागौर सभ्यता (भीलवाड़ा) — (Bagor Civilization)

  • स्थिति: यह सभ्यता राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की मांडलगढ़ तहसील में कोठारी नदी के बाएं तट पर स्थित है।

  • महत्व: यह स्थल भारत में मध्य पाषाण काल का सबसे बड़ा स्थल है। अपनी विशालता और प्राचीनता के कारण इसे “आदिम संस्कृति का संग्रहालय” भी कहा जाता है।

  • खोज व उत्खनन:

    • इसकी खोज वर्ष 1967 में जर्मनी के इतिहासकार डॉ. एल.एस. लेशनी (L.S. Leshnik) तथा प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. वी.एन. मिश्रा (वीरेन्द्रनाथ मिश्रा) द्वारा की गई थी। यहाँ क्षैतिज (Horizontal) उत्खनन किया गया।

    • राज्य सरकार के पुरातत्व विभाग और पूना विश्वविद्यालय के सहयोग से इसका उत्खनन तीन चरणों (बागोर प्रथम, द्वितीय, तृतीय) में पूरा हुआ।

  • सांस्कृतिक चरण:

    • बागोर प्रथम: यह मध्य पाषाण काल से संबंधित है, जहाँ बड़े पैमाने पर लघु पाषाण उपकरण (माइक्रोलिथ) मिले हैं।

    • बागोर द्वितीय: यह ताम्र पाषाण काल से संबंधित है।

    • बागोर तृतीय: यह लोह युग (उत्तर वैदिक काल के समतुल्य) से संबंधित है।

  • प्रमुख पुरातात्विक साक्ष्य एवं विशेषताएँ:

    • महासतियों का टीला: बागौर सभ्यता का पुरातात्विक टीला एक बड़े रेतीले टीले के रूप में है, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘महासतियों का टीला’ कहा जाता है।

    • पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य: यहाँ से भारत में पशुपालन और कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं (जो लगभग 5,000 ईसा पूर्व के हैं)। यहाँ जंगली और पालतू जानवरों की अस्थियाँ मिली हैं।

    • तांबे के उपकरण व छेद वाली सुई: पाषाण कालीन होने के बावजूद यहाँ से तांबे के 5 उपकरण मिले हैं, जिनमें 10.5 सेमी लंबी छेद वाली तांबे की सुई अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    • मानव कंकाल: यहाँ से कुल 4 से 5 मानव कंकाल प्राप्त हुए हैं। कंकाल मिलने से यह सिद्ध होता है कि यहाँ शवों को नियोजित तरीके से दफनाने (समाधि देने) की प्रथा थी। इनमें से एक कंकाल के गले में 36 मोतियों (गुरियों) की माला पाई गई है।

    • अन्य अवशेष: फर्श बनाने के लिए समतल किए गए पत्थर, तीन बाण, घास-फूस की झोपड़ियाँ, शिला-लोढ़े (सिलबट्टा), गधा-शीर्ष, तथा लोमड़ी व गिरगिट के प्रमाण मिले हैं।

2. मंडिया सभ्यता (भीलवाड़ा) — (Mandia Civilization)

  • स्थिति: यह भीलवाड़ा जिले में बनास नदी के तट पर (बागौर से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर की ओर) स्थित है।

  • कालक्रम: इसका कालक्रम लगभग 5000 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के मध्य माना जाता है।

  • खोज: इसकी खोज डॉ. वी.एन. मिश्रा (वीरेंद्रनाथ मिश्रा) द्वारा की गई थी।

  • प्रमुख विशेषताएँ:

    • यह बागौर सभ्यता की समकालीन है और मध्य पाषाण कालीन जीवन शैली को दर्शाती है।

    • यहाँ से निम्न पुरापाषाण कालीन अवशेष तथा माइक्रोलिथ (लघु पाषाण कालीन उपकरण), ब्लेड, नुकीले क्रोड, त्रिकोण और नवचंद्राकार (Crescent) औजार प्राप्त हुए हैं।

    • यहाँ से कुत्ते को पालतू बनाने के प्रारंभिक साक्ष्य मिले हैं।

    • यहाँ से मृदभांड (रंगीन मिट्टी के बर्तन), अग्निकुंड तथा मानव व पशुओं की अस्थियों के अवशेष मिले हैं।

    • यहाँ मृतकों को दफनाने की प्रथा में शव के साथ खाद्य पदार्थ व मृदभांड रखे जाते थे, जो इनकी पारलौकिक आस्था (मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास) को दर्शाते हैं।

3. निम्बाहेड़ा सभ्यता (चित्तौड़गढ़) — (Nimbahera Civilization)

  • स्थिति: यह राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में निंबा और कदमाली (कजली/खाजगी) नदी के तट पर स्थित है। (यह कदमाली नदी गंभीरी नदी की सहायक नदी है)। भौगोलिक दृष्टि से यह मेवाड़ और मालवा के संगम स्थल पर है।

  • खोज व काल: इसकी खोज 1962-63 में डॉ. वी.एन. मिश्रा द्वारा की गई थी। यह एक उत्तर-मध्य पाषाण कालीन (Late Stone Age) तथा ताम्र युगीन स्थल है। इसे कई जगह ‘आहड़ सभ्यता का केंद्र’ या ‘आहड़-निम्बाहेड़ा’ भी कहा जाता है।

  • प्रमुख विशेषताएँ:

    • यह कैल्सिडोनी आधारित उद्योग (कुंठित पृष्ठ ब्लेड्स और ल्यूनेट्स का उत्पादन) का प्रमुख केंद्र था, जहाँ अस्थायी कार्यशालाओं के साक्ष्य मिले हैं।

    • यहाँ मध्य पाषाण काल के अलावा उत्तरवर्ती कालों (मेवाड़ के महाराणाओं, परमारों, चालुक्यों, मुगलों और आधुनिक काल में मराठा-अंग्रेजों) के भी प्रभाव/साक्ष्य मिले हैं।

    • धारेश्वर के शैलाश्रय: निम्बाहेड़ा के पास गुंजा नदी के समीप ‘धारेश्वर’ झरने के पास से मध्य पाषाण युग के शैल चित्र मिले हैं, जिनमें शिकार के दृश्य और नृत्य करते हुए मानव चित्रित हैं (यह चित्र तीन अलग-अलग चरणों के हैं)। ये शैल चित्र मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध ‘भीमबेटका’ और उत्तराखंड के ‘अल्मोड़ा’ के शैल चित्रों से संबंधित हैं।

    • यहाँ से 6 गुफा निवास तथा 11वीं-12वीं शताब्दी के मंदिरों (जैसे मादाखेड़ी गांव का प्राचीन शिव मंदिर) के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।

3. राजस्थान के अन्य मध्य पाषाण कालीन स्थल

बागोर, निम्बाहेड़ा और मंडिया के अतिरिक्त राजस्थान में कुछ अन्य छोटे पुरास्थल भी हैं जहाँ से माइक्रोलिथ उपकरण प्राप्त हुए हैं:

  • तिलवाड़ा (बाड़मेर): बाड़मेर जिले में लूनी नदी के तट पर स्थित है। यहाँ से 5 आवास स्थलों के अवशेष, चाक पर बने स्लेटी रंग के मृदभांड, सिलबट्टा और एक अग्निकुंड (जिसमें मानव अस्थि भस्म तथा मृत पशु के अवशेष मिले हैं) प्राप्त हुए हैं।

  • बेड़च नदी घाटी (चित्तौड़गढ़)

  • विराटनगर / बैराठ (जयपुर)

  • सोहनपुरा (सीकर)

📌 राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ: महत्वपूर्ण मिश्रित वन-लाइनर प्रश्नोत्तर (33 One-Liner Questions)

  1. किस इतिहासकार ने नवपाषाण काल को ‘पाषाण कालीन क्रांति’ की संज्ञा दी है? – गॉर्डन चाइल्ड ने।

  2. राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण प्रारंभ करने का श्रेय किसे जाता है? – ए.सी. कार्लाइल (1871)।

  3. बागोर सभ्यता कहाँ स्थित है? – मांडलगढ़ तहसील, भीलवाड़ा जिले में।

  4. बागोर सभ्यता के किस स्तर से लोह युग के प्रमाण प्राप्त हुए हैं? – बागोर तृतीय (बागोर थर्ड) से।

  5. मध्य पाषाण काल को अन्य किस नाम से जाना जाता है? – माइक्रोलिथ युग या लघु पाषाण काल।

  6. निम्बाहेड़ा सभ्यता भौगोलिक दृष्टि से किन दो क्षेत्रों के संगम स्थल पर स्थित है? – मेवाड़ और मालवा के संगम स्थल पर।

  7. पूरा पाषाण काल के उपकरण मुख्य रूप से किस पत्थर के बने होते थे? – क्वार्ट्जाइट (Quartzite) पत्थर।

  8. बागोर सभ्यता के पुरातात्विक टीले को किस नाम से जाना जाता है? – महासतियों का टीला।

  9. मंडिया सभ्यता का कालक्रम लगभग क्या माना जाता है? – 5000 ईसा पूर्व से 200 ईसा पूर्व के मध्य।

  10. मध्य पाषाण काल में सर्वाधिक किस पत्थर का प्रयोग किया गया? – कैल्सिडोनी (चेल्सडोनी)।

  11. बागोर सभ्यता से तांबे की कितने सेंटीमीटर लंबी छेद वाली सुई मिली है? – 10.5 सेमी।

  12. ‘हैंडऐक्स संस्कृति’ किस काल से संबंधित है? – पूरा पाषाण काल (जयपुर व इंदरगढ़ से हैंडऐक्स मिले)।

  13. बागोर सभ्यता का उत्खनन किसके द्वारा किया गया? – वी.एन. मिश्रा और डॉ. एल.एस. लेशनी (1967-69)।

  14. निम्बाहेड़ा के पास धारेश्वर झरने से प्राप्त शैल चित्रों की तुलना भारत के किस प्रसिद्ध स्थान से की जाती है? – मध्य प्रदेश के ‘भीमबेटका’ और उत्तराखंड के ‘अल्मोड़ा’ के शैल चित्रों से।

  15. भारत में पशुपालन और कृषि के प्राचीनतम साक्ष्य किस सभ्यता से मिले हैं? – बागौर सभ्यता से।

  16. बागोर सभ्यता किस नदी के किनारे स्थित है? – कोठारी नदी के बाएं तट पर।

  17. किस सभ्यता को ‘आदिम संस्कृति का संग्रहालय’ कहा जाता है? – बागौर की सभ्यता को।

  18. बागोर सभ्यता से कुल कितने मानव कंकाल मिले हैं? – 4 से 5 कंकाल।

  19. बागोर सभ्यता के कितने सांस्कृतिक चरणों (स्तरों) के साक्ष्य मिले हैं? – तीन चरण (बागोर I, II और III)।

  20. मंडिया सभ्यता कहाँ और किस नदी के किनारे स्थित है? – भीलवाड़ा जिले में बनास नदी के किनारे।

  21. कुत्ते को पालतू बनाने के प्रारंभिक साक्ष्य राजस्थान में कहाँ से मिले हैं? – मंडिया सभ्यता से।

  22. निम्बाहेड़ा सभ्यता किस जिले में और किस नदी के पास स्थित है? – चित्तौड़गढ़ जिले में निंबा व कदमाली (कजली) नदी के पास।

  23. धारेश्वर शैली के शैल चित्र कहाँ से प्राप्त हुए हैं? – निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़) से।

  24. तिलवाड़ा सभ्यता किस नदी के तट पर स्थित है? – लूनी नदी (बाड़मेर) के तट पर।

  25. पुरापाषाण काल से मध्य पाषाण काल के संक्रमण के काल को क्या कहा जाता है? – एपिलोथिक काल।

  26. भरतपुर के किस स्थान से पुरापाषाण कालीन शैल चित्र (मानव आकृति, व्याघ्न, बारहसिंगा) मिले हैं? – ‘दर’ नामक स्थान से।

  27. बागोर सभ्यता से प्राप्त एक कंकाल के गले में कितने मोतियों (गुरियों) की माला पाई गई है? – 36 मोतियों की माला।

  28. मंडिया सभ्यता से प्राप्त मृतकों के साथ खाद्य पदार्थ व मृदभांड रखने की प्रथा क्या दर्शाती है? – पारलौकिक आस्था (मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास)।

  29. निम्बाहेड़ा सभ्यता से कितने गुफा निवास प्राप्त हुए हैं? – 6 गुफा निवास।

  30. बाड़मेर जिले की तिलवाड़ा सभ्यता से कितने आवास स्थलों के अवशेष मिले हैं? – 5 आवास स्थलों के अवशेष।

  31. तिलवाड़ा सभ्यता से प्राप्त अग्निकुंड में क्या अवशेष मिले हैं? – मानव अस्थि भस्म तथा मृत पशु के अवशेष।

  32. कैल्सिडोनी आधारित उद्योग (कुंठित पृष्ठ ब्लेड्स और ल्यूनेट्स का उत्पादन) के प्रमुख साक्ष्य कहाँ से मिले हैं? – निम्बाहेड़ा सभ्यता से।

  33. सीकर जिले का कौन सा स्थल मध्य पाषाण कालीन माइक्रोलिथ उपकरणों के लिए जाना जाता है? – सोहनपुरा।

📌 निष्कर्ष (Conclusion)

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ—विशेषकर बागोर, मंडिया और निम्बाहेड़ा—मानव सभ्यता के क्रमिक विकास, पाषाण युगीन तकनीकों और मध्य पाषाण कालीन संस्कृति के जीवंत प्रमाण हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के लिए ये स्थल, इनसे जुड़े पुरातात्विक साक्ष्य और वन-लाइनर प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण और स्कोरिंग साबित होंगे।

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