Last Updated on September 19, 2026 by KevalKrishan
राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन: संपूर्ण इतिहास, प्रमुख संस्थाएँ, नोट्स, और महत्त्वपूर्ण तथ्य (Rajasthan ke Prajamandal Andolan)
राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन (Rajasthan ke Prajamandal Andolan) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, रियासती जन-जागृति और आधुनिक राजस्थान के निर्माण का एक स्वर्णिम एवं क्रांतिकारी अध्याय है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में राजस्थान की विभिन्न रियासतों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद, सामंती कुप्रथाओं, जागीरदारी अत्याचारों तथा रियासती कुशासन के विरुद्ध जो राजनीतिक विप्लव फूटा, उसे ही ‘प्रजामंडल आंदोलन’ के रूप में जाना जाता है। इस विस्तृत एवं शोधपरक लेख में हम Rajasthan Movement in Rajasthan, Prajamandal Movement in Rajasthan Notes PDF, राजस्थान में प्रजामंडल आंदोलन नोट्स और राजस्थान के सभी प्रमुख प्रजामंडलों, उनकी स्थापना, प्रमुख नेताओं, महिलाओं के योगदान, ऐतिहासिक कांडों और प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे UGC NET, RPSC RAS, REET, Grade 1 & 2) के दृष्टिकोण से सभी महत्त्वपूर्ण बिंदुओं का अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक विश्लेषण करेंगे।
📌 Quick Overview (संक्षिप्त परिचय)
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मुख्य फोकस कीवर्ड: राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन (Rajasthan ke Prajamandal Andolan)
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प्रथम राजनीतिक संस्था: राजस्थान सेवा संघ (स्थापना: 1919, वर्धा; बाद में अजमेर स्थानांतरित)
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प्रजामंडलों का मुख्य उद्देश्य: रियासती कुशासन को समाप्त करना, राजाओं के संरक्षण में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना और जनता को मौलिक अधिकार दिलाना
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हरिपुरा अधिवेशन (1938): कांग्रेस के इस ऐतिहासिक अधिवेशन (अध्यक्षता: सुभाष चंद्र बोस) में देशी रियासतों में प्रजामंडलों की स्थापना का आधिकारिक प्रस्ताव पारित हुआ
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प्रमुख प्रजामंडल क्षेत्र: जयपुर, मेवाड़ (उदयपुर), मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर, कोटा, अलवर, भरतपुर, सिरोही, जैसलमेर और झालावाड़ आदि
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अंतिम प्रजामंडल: झालावाड़ प्रजामंडल (स्थापना: 1946, मांगीलाल भव्य) जिसे राजशाही संरक्षण प्राप्त था
राजस्थान में राजनीतिक चेतना का उदय और प्रजामंडलों की पृष्ठभूमि
1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक चेतना जगाने का उल्लेखनीय प्रयास किया। राजस्थान जैसी जागीरदारी और सामंती व्यवस्था से जकड़ी हुई रियासतों में राष्ट्रीय चेतना का संचार करना एक अत्यंत दुरूह कार्य था। राजस्थान में राजनैतिक चेतना जगाने के क्षेत्र में प्रथम प्रयास 1919 ई. में ’राजस्थान सेवा संघ’ के रूप में हुआ। इसकी स्थापना वर्धा में श्री विजयसिंह पथिक व रामनारायण चौधरी के प्रयासों से हरिभाई किंकर के द्वारा की गई। 1920 ई. में राजस्थान सेवा संघ का कार्यालय अजमेर स्थानान्तरित कर दिया गया ताकि यहाँ की राजनीतिक गतिविधियों का दायरा बढ़ाया जा सके।
जब राजस्थान सेवा संघ के सदस्यों में आपसी मनमुटाव उत्पन्न होने लगा और यह संघ धीरे-धीरे निष्क्रिय होने की स्थिति में आ गया, तब वर्ष 1919 में ही सेठ जमनालाल बजाज के अनथक प्रयासों से ’राजपूताना मध्य भारत सभा’ नामक संस्था की स्थापना दिल्ली में की गई। इस संस्था का प्रधान कार्यालय अजमेर में ही रखा गया और इसका प्रथम अधिवेशन 1920 ई. में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के साथ ही आयोजित किया गया।
वर्ष 1927 ई. में राजनैतिक चेतना को प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत करने के लिए देशी राज्यों के प्रतिनिधियों ने बम्बई में एक समिति का गठन किया, जिसका नाम ’अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद्’ रखा गया। रामनारायण चौधरी के विशेष प्रयासों से 1931 ई. में अजमेर में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् का प्रथम प्रांतीय अधिवेशन आयोजित किया गया।
“प्रजामंडलों का मुख्य उद्देश्य राजाओं के संरक्षण में राज्य में उत्तरदायी शासन की स्थापना करते हुए जनता को न्याय दिलाना और जनता के प्रति जवाबदेह शासन व्यवस्था का सूत्रपात करना था।”
किंतु, राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर पर राजनैतिक चेतना जगाने के ये प्रयास तब तक जमीन पर असर नहीं दिखा पा रहे थे जब तक स्थानीय स्तर पर जनता संगठિત न हो। वर्ष 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन (गुजरात) में उत्तरदायी शासन का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु स्थानीय रियासतों में प्रजामंडलों की स्थापना का स्पष्ट प्रस्ताव पारित किया गया। इस ऐतिहासिक हरिपुरा अधिवेशन की अध्यक्षता राष्ट्रनायक सुभाषचंद्र बोस ने की थी, जिसके बाद राजस्थान की हर रियासत में प्रजामंडलों की स्थापना का एक कारवाँ चल पड़ा।
राजस्थान के प्रमुख प्रजामंडल और उनकी स्थापना
परीक्षाओं में तिथियों, संस्थापकों और स्थापना स्थलों से संबंधित प्रश्न बहुतायत से पूछे जाते हैं। नीचे दी गई सारणी में राजस्थान के सभी 19 प्रमुख प्रजामंडलों, उनकी स्थापना वर्ष और उनके संस्थापक नेताओं की संपूर्ण एवं प्रामाणिक जानकारी दी गई है:
| क्र.सं. | राजस्थान के प्रजामंडल | स्थापना वर्ष | संस्थापक / प्रमुख नेता |
| 1 | जयपुर प्रजामंडल | 1931 ई. (पुनर्गठन 1936-38) | कर्पूर चंद पाटनी (पुनर्गठन: जमनालाल बजाज) |
| 2 | बूंदी प्रजामंडल | 1931 ई. | कांतिलाल |
| 3 | मारवाड़ प्रजामंडल | 1934 ई. | जयनारायण व्यास, भंवर लाल सर्राफ |
| 4 | कोटा प्रजामंडल | 1934 / 1939 ई. | पं. नयनूराम शर्मा / अभिन्न हरि |
| 5 | धौलपुर प्रजामंडल | 1936 ई. | कृष्ण दत्त पालीवाल, मूलचंद, ज्वाला प्रसाद |
| 6 | बीकानेर प्रजामंडल | 1936 ई. | मघाराम वैद्य, चंदनमल बहड़ |
| 7 | मेवाड़ प्रजामंडल | 1938 ई. | माणिक्य लाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता |
| 8 | अलवर प्रजामंडल | 1938 ई. | हरिमोहन शर्मा, कुंजबिहारी लाल मोदी |
| 9 | भरतपुर प्रजामंडल | 1938 ई. | किशन लाल जोशी, गोपीलाल यादव |
| 10 | शाहपुरा प्रजामंडल | 1938 ई. | रमेश दत्त ओझा, लादूराम व्यास |
| 11 | सिरोही प्रजामंडल | 1939 ई. | गोकुलभाई भट्ट |
| 12 | करौली प्रजामंडल | 1939 ई. | त्रिलोक चंद माथुर |
| 13 | किशनगढ़ प्रजामंडल | 1939 ई. | कांतिचंद चौथानी, जमालशाह |
| 14 | कुशलगढ़ प्रजामंडल | 1942 ई. | भंवरलाल निगम, कन्हैयालाल |
| 15 | बांसवाड़ा प्रजामंडल | 1943 ई. | भूपेन्द्र लाल त्रिवेदी, धूलजी भाई |
| 16 | डूंगरपुर प्रजामंडल | 1944 ई. | भोगी लाल पांड्या, शिवलाल कोटड़िया |
| 17 | जैसलमेर प्रजामंडल | 1945 ई. | मीठालाल व्यास |
| 18 | प्रतापगढ़ प्रजामंडल | 1945 ई. | चुन्नीलाल एवं अमृतलाल |
| 19 | झालावाड़ प्रजामंडल | 1946 ई. | मांगीलाल भव्य, मकबूल आलम |
प्रमुख प्रजामंडलों का विस्तृत इतिहास, संघर्ष और जन-आंदोलन
राजस्थान की विभिन्न रियासतों में सामंती शोषण, बेगार प्रथा और निरंकुश राजशाही के विरुद्ध हुए इन जन-आंदोलनों ने आम जनता में राजनीतिक अधिकारों के प्रति नई चेतना जगाई। इस अनुभाग में हम मेवाड़, मारवाड़, बीकानेर और जयपुर सहित सभी प्रमुख प्रजामंडलों के संघर्ष, ऐतिहासिक घटनाओं और क्रूर दमन के विरुद्ध जनता के साहसिक प्रतिरोध का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
मेवाड़ प्रजामंडल (Mewad Prajamandal)
बिजौलिया सत्याग्रह और बेगूं किसान आंदोलन की आंशिक सफलता से प्रेरित होकर माणिक्य लाल वर्मा ने बलवंत सिंह मेहता, हीरालाल कोठारी, भूरेलाल बया, रमेशचंद्र व्यास, भवानीशंकर वैध व अन्य साथियों से विचार-विमर्श करके 24 अप्रैल, 1938 को मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना की।
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प्रथम सभापति: बलवंतसिंह मेहता
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उपाध्यक्ष: भूरेलाल बया
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मंत्री: माणिक्य लाल वर्मा
उदयपुर राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री धर्म नारायण ने इस संस्था को 11 मई, 1938 को गैर-कानूनी घोषित कर दिया और माणिक्य लाल वर्मा तथा रमेश चंद्र व्यास को शहर छोड़ देने का आदेश दिया। भूरेलाल बया को सराड़ा किले में नजरबंद कर दिया गया। 4 अक्टूबर 1938 को विजयादशमी के दिन प्रजामंडल ने सत्याग्रह करने का निर्णय लिया और यह माँग की कि प्रजामंडल को कानूनी संस्था माना जाए तथा माणिक्य लाल वर्मा को पुनः उदयपुर प्रवेश दिया जाए।
माणिक्य लाल वर्मा ने मेवाड़ से बाहर अजमेर से सत्याग्रह का संचालन किया। यहीं इन्होंने ’मेवाड़ का वर्तमान शासन’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक लिखकर मेवाड़ प्रशासन के कुकृत्यों को जनसाधारण के समक्ष उजागर किया। इस आंदोलन का सबसे अधिक प्रभाव नाथद्वारा में देखने को मिला। पुलिस ने नरेन्द्रपाल सिंह और प्रो. नारायण दास को गिरफ्तार कर लिया तथा भीड़ पर लाठीचार्ज किया। इस प्रजामंडल आन्दोलन में नाथद्वारा की गंगाबाई ने अत्यंत सक्रिय और साहसिक भूमिका निभाई थी।
गांधीजी ने ’हरिजन’ पत्र में इस अमानुषिक व्यवहार की बड़ी भर्त्सना की। 3 मार्च 1939 को महात्मा गाँधी ने मेवाड़ प्रजामंडल को सत्याग्रह स्थगित कर रचनात्मक कार्य करने की सलाह दी, जिसके बाद सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया। इसके पश्चात टी. राघवाचारी को मेवाड़ का नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। नवम्बर 1941 में मेवाड़ प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन माणिक्य लाल वर्मा के सभापतित्व में उदयपुर की शाहपुरा हवेली में संपन्न हुआ, जिसका उद्घाटन झण्डा समिति के अध्यक्ष जे.बी. कृपलानी ने किया था।
मारवाड़ (जोधपुर) प्रजामंडल (Marwar Prajamandal)
मारवाड़ क्षेत्र में राजनीतिक चेतना का इतिहास अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा है। मारवाड़ सेवा संघ की स्थापना 1920 ई. में की गई थी। 1922 में जयनारायण व्यास और चांदमल सुराणा ने इस संस्था में सम्मिलित होकर इसमें नई जान फूँकी। 1924 में ’मारवाड़ हितकारिणी सभा’ गठित हुई, जिसके द्वारा ’पोपाबाई का राज’ तथा ’मारवाड़ की अवस्था’ जैसे क्रांतिकारी पत्र और पुस्तिकाएँ प्रकाशित की गईं।
10 मई, 1931 ई. को जयनारायण व्यास ने मारवाड़ ’यूथ लीग’ की स्थापना की। 1932 ई. में मारवाड़ में पहली बार स्वाधीनता दिवस मनाया गया और छगनराज चौपासनीवाला ने आन बान के साथ तिरंगा फहराया। अंततः 1934 में जयनारायण व्यास के प्रयासों से मानमल जैन, अभयमल मेहता और छगनराज चौपासनीवाला ने मिलकर ’मारवाड़ प्रजामंडल’ की स्थापना की, जिसके प्रथम अध्यक्ष भंवर लाल सर्राफ बनाए गए। 1936 में मारवाड़ प्रजामंडल द्वारा बम्बई में ’कृष्णा दिवस’ मनाया गया।
डाबड़ा का हत्याकांड (Dabra Massacre)
“मारवाड़ के एक गाँव में बिना किसी न्यायसंगत कारण के 700 पुष्करणा ब्राह्मण परिवारों को बाहर निकाल देने के विरोध में 13 मार्च 1947 ईस्वी को नागौर जिले के डाबड़ा गाँव में एक विशाल किसान सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा पर जागीरदारों के गुर्गों ने हमला कर दिया, जिसमें चुन्नी लाल शर्मा, रामाराव, रुग्धा राम एवं तीन अन्य किसान वीरगति को प्राप्त हुए। इन शहीदों की याद में प्रतिवर्ष 13 मार्च को डाबड़ा गाँव में मेला भरता है।”
1938 में ’मारवाड़ लोक परिषद्’ की स्थापना की गई, जिसके महासचिव अभयमल मेहता नियुक्त हुए। इस परिषद् का उद्देश्य महाराजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था। 1941 में जोधपुर में ’उत्तरदायी दिवस’ मनाया गया और 26 जुलाई, 1942 को ’मारवाड़ सत्याग्रह दिवस’ धूमधाम से मनाया गया। महिमादेवी किंकर ने प्रतिबंधित पुस्तक ’उत्तरदायी शासन’ पढ़कर सुनाई और 17 जुलाई 1942 को महिलाओं के सत्याग्राही जत्थे का नेतृत्व किया। 1947 में मारवाड़ लोक परिषद् द्वारा ’विधानसभा दिवस’ का आयोजन किया गया।
बीकानेर प्रजामंडल (Bikaner Prajamandal)
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बीकानेर रियासत में चल रहे सर्वव्यापी दमन के बारे में एक अत्यंत मार्मिक और कठोर टिप्पणी की थी:
“जहाँ शादी की कुमकुम पत्रिकाएँ राज्य से सेंसर करानी पड़ती हों, उस राज्य का शासक इंसान नहीं, हैवान है।”
1912 ई. में बीकानेर राज्य के चूरू में स्वामी गोपाल दास द्वारा ‘सर्वहितकारिणी सभा’ की स्थापना की गई, जिसके अंतर्गत चूरू में कबीर पाठशाला तथा पुत्री पाठशाला की स्थापना की गई। 26 जनवरी 1930 को स्वामी गोपालदास तथा चंदनमल बहड़ के द्वारा चूरू के धर्म स्तूप पर तिरंगा झंडा फहराया गया और यह प्रसिद्ध नारा दिया गया:
“अखरो रिपयो चाँदी गो, राज महात्मा गाँधी रो।”
जुलाई 1932 में बीकानेर राज्य में सार्वजनिक सुरक्षा कानून पारित किया गया, जिसे ‘बीकानेर का काला कानून’ कहा जाता है। 4 अक्टूबर, 1936 को मघाराम वैद्य, चंदनमल बहड़ और लक्ष्मीदेव आचार्य ने कलकत्ता में बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना की। मघाराम वैद्य इसके प्रथम अध्यक्ष बनाए गए। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘बीकानेर की थोथी-पोथी’ है।
22 जुलाई, 1942 ई. को रघुवर दयाल गोयल, गंगादास कौशिक और दाऊदयाल आचार्य ने बीकानेर राज्य प्रजा परिषद् की स्थापना की। 26 अक्टूबर 1944 को सारे राजस्थान में ’बीकानेर दमन विरोधी दिवस’ मनाया गया, जो राज्य में पहला ऐसा बड़ा सार्वजनिक प्रदर्शन था। 30 जून, 1946 ई. को रायसिंहनगर में हो रहे प्रजा परिषद् के सम्मेलन में पुलिस ने क्रूरतापूर्वक गोलीबारी की।
शहीद बीरबल दिवस (Birbal Day)
“1 जुलाई, 1946 को सत्यनारायण सर्राफ की अध्यक्षता में बीकानेर राज्य प्रजा परिषद् के कार्यकर्ताओं द्वारा रायसिंहनगर (श्रीगंगानगर) अधिवेशन में पुलिस सैनिकों द्वारा की गई अंधाधुंध गोलीबारी में क्रांतिकारी दलित युवक बीरबलसिंह शहीद हो गये। उनकी शहादत की स्मृति में 17 जुलाई, 1946 को बीकानेर प्रजा परिषद् द्वारा समूचे क्षेत्र में ’शहीद बीरबल दिवस’ मनाया गया।”
जयपुर प्रजामंडल (Jaipur Prajamandal) एवं जेंटलमेंट समझौता
जयपुर रियासत में राजनीतिक चेतना जगाने का मुख्य श्रेय अर्जुनलाल सेठी और सेठ जमनालाल बजाज को जाता है। अर्जुनलाल सेठी ने जयपुर नगर में 1907 में ’जैन शिक्षा प्रचारक समिति’ की स्थापना की और वर्धमान विद्यालय का संचालन आरंभ किया। इस शिक्षण संस्था का उद्देश्य क्रांतिकारियों को वैचारिक और शारीरिक प्रशिक्षण देना था। केसरीसिंह बारहठ के पुत्र प्रतापसिंह बारहठ और अन्य क्रांतिकारियों ने यहीं से प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
सन् 1931 ई. में श्रीकर्पूरचंद पाटनी ने जयपुर प्रजामंडल की स्थापना की, परंतु यह संस्था आरंभ में लंबे समय तक निष्क्रिय रही। 1936-37 में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष सेठ जमनालाल बजाज की प्रेरणा से प्रजामंडल को पुनः क्रियाशील बनाया गया। 9 मई, 1938 को सेठ जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन जयपुर में संपन्न हुआ।
जेंटलमेंट समझौता क्या था?
“वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय जयपुर प्रजामंडल के प्रमुख नेता हीरालाल शास्त्री तथा जयपुर रियासत के प्रधानमंत्री सर मिर्जा इस्माइल के मध्य एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे ‘जेंटलमेंट समझौता’ कहा जाता है। इस समझौते के तहत प्रजामंडल ने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग न लेने का निर्णय लिया, क्योंकि इसके बदले में मिर्जा इस्माइल खान ने जयपुर रियासत में उत्तरदायी शासन की स्थापना करने और भविष्य में प्रजामंडल को मान्यता देने का आश्वासन दिया था।”
जब जेंटलमेंट समझौते के कारण जयपुर प्रजामंडल ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से अपने आपको अलग कर लिया, तब युवा नेता बाबा हरिश्चन्द्र ने इस समझौते के विरोध में 1942 में ‘आजाद मोर्चे’ का गठन कर दिया। अंततः 1945 ई. में पं. जवाहरलाल नेहरू की मध्यस्थता से आजाद मोर्चे का विलय वापस जयपुर प्रजामंडल में कर दिया गया। जयपुर एकमात्र ऐसा प्रजामंडल था जिसमें गैर-सरकारी सदस्य के रूप में देवीशंकर तिवारी को प्रशासनिक सुधार समिति में चुना गया।
कोटा प्रजामंडल (Kota Prajamandal)
कोटा में राजनीतिक चेतना जगाने का श्रेय पं. नयनूराम शर्मा को जाता है। कोटा प्रजामंडल की स्थापना 1934 ई. में पं. नयनूराम शर्मा ने ’हाड़ौती प्रजामंडल’ के नाम से विजयादशमी के दिन की थी। हाड़ौती प्रजामंडल की स्थापना से पूर्व पं. नयनूराम शर्मा कोटा रियासत में पुलिस सेवा में थे जिसे उन्होंने राष्ट्रहित में त्याग दिया था। 1939 में पं. नयनूराम शर्मा ने अभिन्न हरि के सहयोग से औपचारिक रूप से कोटा राज्य प्रजामंडल की स्थापना की। 14 अक्टूबर 1939 को मांगरोल में इसका प्रथम अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता पं. नयनूराम शर्मा ने की। इसी दौरान श्रीमती शारदा भार्गव की अध्यक्षता में प्रथम महिला सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें 6 वर्ष तक के बालकों के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रस्ताव पारित हुआ। 1939 में ही पं. नयनूराम शर्मा की असामयिक हत्या हो जाने पर प्रजामंडल की बागडोर पं. अभिन्न हरि ने सँभाली।
अलवर प्रजामंडल (Alwar Prajamandal)
1921 ई. में अलवर सरकार द्वारा किसानों को जंगली सूअर मारने पर पाबंदी लगाने से किसान वर्ग आक्रोशित हो गया। ब्रिटिश सरकार ने अलवर नरेश जयसिंह को 22 मई, 1933 को राज्य से निष्कासित कर तेजसिंह को गद्दी पर बिठाया। इस दमनकारी नीति के विरुद्ध श्री कुंजबिहारी लाल मोदी व हरिनारायण शर्मा ने मुखर विरोध किया। जेल से मुक्त होने के पश्चात दोनों ने 1938 में ’अलवर राज्य प्रजामंडल’ की स्थापना की। अलवर प्रजामंडल का प्रथम अधिवेशन 1944 में भवानी शंकर की अध्यक्षता में हुआ। मास्टर भोलानाथ के प्रयासों से 1946 में ’जिम्मेदार मिनिस्टर कुर्सी छोड़ो’ आंदोलन चलाया गया। अलवर में दलित जातियों के उत्थान के लिए पं. हरिनारायण शर्मा ने ‘आदिवासी संघ’, ‘वाल्मीकि संघ’ व ‘अस्पृश्यता निवारण संघ’ की स्थापना की।
भरतपुर प्रजामंडल (Bharatpur Prajamandal)
भरतपुर में स्वतंत्रता आंदोलन का श्रीगणेश जगन्नाथ दास अधिकारी व गंगा प्रसाद शास्त्री ने किया। सितंबर 1937 में एक प्रतिनिधिमंडल जवाहरलाल नेहरू से मिला और उनकी मंत्रणा पर दिसंबर 1938 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के उपरांत भरतपुर से बाहर रेवाड़ी में भरतपुर प्रजामंडल की स्थापना की गई। किशनलाल जोशी के प्रयासों और गोपीलाल यादव की अध्यक्षता में इस प्रजामंडल का गठन हुआ। 25 अक्टूबर, 1939 को इसका नाम बदलकर ’भरतपुर प्रजा परिषद्’ कर दिया गया। भरतपुर की राजनीति में गोकुल जी वर्मा को “भरतपुर का बुढ़ा शेर” कहा जाता है, तथा महात्मा गांधी उन्हें अपने आश्रम में “भरतपुरवाला” कहकर पुकारते थे।
धौलपुर प्रजामंडल (Dholpur Prajamandal)
धौलपुर में जनजागृति के अग्रदूत यमुना प्रसाद वर्मा थे जिन्होंने 1910 में ‘आचार सुधारिणी सभा’ और 1911 में आर्य समाज की स्थापना की। धौलपुर प्रजामंडल की स्थापना 1936 ई. में कृष्णदत्त पालीवाल, मूलचंद, ज्वाला प्रसाद एवं जवाहरलाल द्वारा की गई।
तसीमो काण्ड (Tasimo Kand)
“धौलपुर प्रजामंडल की गतिविधियों के दौरान 11 अप्रैल, 1947 ई. को तसीमोगाँव में अंग्रेजों की क्रूर गोलियों से ठाकुर छत्रसिंह परमार व ठाकुर पंचमसिंह कच्छवाहा देश के लिए शहीद हो गए। इसे ही ‘तसीमो काण्ड (धौलपुर)’ कहा जाता है। शहीदों की स्मृति में यहाँ प्रतिवर्ष 11 अप्रैल को मेला भरता है।”
सिरोही प्रजामंडल (Sirohi Prajamandal)
सिरोही के कुछ उत्साही युवकों (वृद्ध किशोर, भीमशंकर, समर्थलाल सिंधी) ने 1934 में बम्बई में प्रजामंडल की स्थापना की थी, किंतु इसके कोई विशेष परिणाम नहीं निकले। अंततः हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के निर्णय के उपरांत श्री गोकुलभाई भट्ट ने 23 जनवरी, 1939 को सिरोही में प्रजामंडल की स्थापना की। सिरोही प्रजामंडल के तत्वावधान में हुई एक सार्वजनिक सभा पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया जिसमें अनेक लोग घायल हो गए। इस बर्बरता की महात्मा गाँधी ने अपने समाचार पत्र ’हरिजन सेवक’ में कड़ी आलोचना की थी।
जैसलमेर प्रजामंडल (Jaisalmer Prajamandal)
जैसलमेर में सागरमल गोपा ने महारावल के निरंकुश शासन का डटकर विरोध किया। 22 मई, 1941 को सागरमल गोपा को बंदी बना लिया गया और उन्हें 6 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। उनका ‘अपराध’ केवल इतना था कि उन्होंने अपनी प्रख्यात पुस्तक ’जैसलमेर में गुंडाराज’ में महारावल के अत्याचारपूर्ण कृत्यों का पर्दाफाश किया था। इस समय जैसलमेर के शासक जवाहरसिंह थे। 3 अप्रैल, 1946 को जेलर गुमानसिंह ने सागरमल गोपा को जेल में मिट्टी का तेल छिड़क कर जला दिया, जिससे 4 अप्रैल 1946 को उनकी संदेहास्पद मृत्यु हो गई। इस हत्याकांड की जाँच हेतु ‘पाठक आयोग’ गठित किया गया जिसने इसे आत्महत्या करार दिया, परंतु जनता ने इसे निर्मम हत्या माना। सागरमल गोपा की शहादत के पश्चात जैसलमेर में ’खून रो बदलो खून’ का नारा गूँजा। 15 दिसम्बर, 1945 को मीठालाल व्यास ने जैसलमेर राज्य प्रजामंडल की स्थापना जोधपुर में की थी।
प्रजामंडलों से जुड़ी प्रमुख महिला क्रान्तिकारी और उनका योगदान
राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलनों को गति प्रदान करने में महिलाओं ने अपनी सुयोग्य नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। परीक्षा की दृष्टि से प्रमुख महिला क्रांतिकारियों का विवरण इस प्रकार है:
| क्र.सं. | महिला क्रांतिकारी का नाम | संबंधित प्रजामंडल / क्षेत्र | प्रमुख योगदान |
| 1 | नारायणी देवी वर्मा | मेवाड़ प्रजामंडल | 24 अगस्त 1942 को 7 महिलाओं के साथ उदयपुर शहर में सत्याग्रह किया और महिलाओं को संगठित किया। |
| 2 | महिमा देवी किंकर | मारवाड़ प्रजामंडल | प्रतिबंधित पुस्तक ‘उत्तरदायी शासन’ सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाई और 1942 में सत्याग्रही जत्थे का नेतृत्व किया। |
| 3 | शारदा भार्गव | कोटा प्रजामंडल | कोटा प्रजामंडल के प्रथम महिला सम्मेलन की अध्यक्षता की और बालिकाओं की अनिवार्य शिक्षा का प्रस्ताव रखा। |
| 4 | दुर्गावती शर्मा | जयपुर प्रजामंडल | जयपुर रियासत में जन-जागृति और प्रजामंडल की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया। |
| 5 | गंगाबाई | नाथद्वारा (मेवाड़) | मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन और नाथद्वारा सत्याग्रह के दौरान पुलिस लाठीचार्ज के बीच अभूतपूर्व सक्रियता दिखाई। |
💡 परीक्षार्थियों के लिए विशेष परीक्षा उपयोगी टिप्स (Exam Tips & Tricks)
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📌 सबसे पहला प्रजामंडल: जयपुर प्रजामंडल (1931) सबसे पहले स्थापित हुआ, लेकिन इसे वास्तविक सांगठनिक गति 1936-38 में जमनालाल बजाज के आने के बाद मिली।
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📌 एकमात्र राजशाही संरक्षित प्रजामंडल: झालावाड़ प्रजामंडल (1946) जिसकी स्थापना मांगीलाल भव्य ने की थी और इसके शासक महाराजा हरिश्चंद्र ने स्वयं प्रधानमंत्री पद संभालकर इसे संरक्षण दिया था।
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📌 बाहर स्थापित होने वाले प्रजामंडल: बीकानेर (कलकत्ता में मघाराम वैद्य द्वारा), जैसलमेर (जोधपुर में मीठालाल व्यास द्वारा), और भरतपुर (रेवाड़ी में किशनलाल जोशी द्वारा) रियासत की भौगोलिक सीमा से बाहर स्थापित किए गए थे।
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📌 प्रमुख पुस्तकें और उनके लेखक:
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‘मेवाड़ का वर्तमान शासन’ – माणिक्य लाल वर्मा
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‘जैसलमेर में गुंडाराज’ – सागरमल गोपा
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‘पोपाबाई का राज’ व ‘मारवाड़ की अवस्था’ – जयनारायण व्यास
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‘बीकानेर की थोथी-पोथी’ – मघाराम वैद्य
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🎯 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलन (Rajasthan ke Prajamandal Andolan) केवल रियासती सत्ता के विरुद्ध कुछ गिने-चुने नेताओं का संघर्ष मात्र नहीं था, बल्कि यह राजस्थान के इतिहास का एक व्यापक, बहुआयामी और युगांतकारी लोक-आंदोलन था। इन आंदोलनों ने सदियों से सामंती जुल्मों, बेगार प्रथा, लाग-बाग और निरंकुश राजशाही के अंधेरे में जी रही राजस्थान की जनता को नागरिक अधिकारों, समानता, स्वतंत्रता और उत्तरदायी शासन का अमूल्य बोध कराया। प्रजामंडलों के अथक संघर्ष, त्याग और बलिदान के परिणामस्वरूप ही अंततः स्वतंत्र भारत में रियासतों का विलय संभव हो सका और एक अखंड, आधुनिक व लोकतांत्रिक राजस्थान का मार्ग प्रशस्त हुआ।
## FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
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